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रविवार, जनवरी 16, 2011

अगर आपकी गाड़ी अक्सर खराब ही रहती है...

क्या आपने कभी इस बात पर ध्यान दिया कि आपका वाहन, बाइक, कार या कोई हैवी व्हीकल हमेशा खराब रहता है। आप बार बार उसे ठीक करवाते हैं, उस पर पैसे खर्च करते हैं फिर भी आपका वाहन आपका साथ नहीं देता। ज्योतिष के नजरिए से देखें तो निश्चित ही आपकी कुंडली में शनि और मंगल अशुभ प्रभाव दे रहे हैं।
जी हां, ज्योतिष में वाहन के विषय में शनि और मंगल का विचार किया जाता है। शनि और मंगल के अशुभ प्रभाव से ही आपका वाहन हमेशा खराब रहता है।
यदि कुंडली में शनि या मंगल चौथे भाव के स्वामी होकर अपनी शत्रु राशि में स्थित होते हैं या कुंडली के 6, 8, 12 भाव में होते है तो आपका वाहन हमेशा खराब रहेगा। इससे गाड़ी में हमेशा कुछ-न-कुछ खराबी बनी रहती है। कभी रास्ते में चलते-चलते भी रुक जाती है तो कभी एक बार बंद होने के बाद स्टार्ट नहीं होती। इस परेशानी को ज्योतिषीय तरीकों से भी हल किया जा सकता है। इसके लिए आपको शनि और मंगल को मनाने के उपाय करने होंगे। ये उपाय जितने आसान हैं उतने ही कारगर भी हैं। इन्हें अपनाने से आपको फिर कभी ऐसी परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ेगा।
इसके लिए आप मंगल और शनि से संबंधित उपाय करें-
- अपनी बाइक पर रेडियम से लाल त्रिकोण बनाएं।
- कार में मंगल यंत्र रखें।
- मंगलवार के दिन पेट्रोल, डीजल या गैस न डलवाएं।
- अपने वाहन के आगे सिंदूर से स्वास्तिक बनाएं।
- कौवों को पूड़ी और खीर खिलाएं।

खुद में रहें, दूसरों में न उलझें

अक्सर लोग दुनियादारी में इतने उलझ जाते हैं कि खुद को ही भूल जाते हैं। खुद का ख्याल नहीं होना भी परेशानी देता है। लोग खुद का ध्यान नहीं रखते, दूसरे क्या कर रहे हैं, वे कहां पहुंच रहे हैं, इसी में उनकी जिंदगी गुजर जाती है। यह शरीर, आत्मा हमारी है, हम जब भी कोई काम करें तो उसमें खुद को रखें। ये दुनिया ऊपर वाले का ख्वाब है, परमात्मा की माया है। भगवान जब सपने देखता है तो दुनिया का निर्माण हो जाता है। यह एक सूफी खयाल है। इसी तरह जब हम दुनिया में रहें और यदि हमें यह बात समझ में आ जाए कि है तो परमात्मा का सपना फिर भी सच है और हम इस सच का हिस्सा हैं। इसीलिए इस्लाम में, सूफी परम्परा में एक प्रयोग किया गया है कि जो भी काम हम करें उसमें अच्छी तरह खयाल रखें कि हम हैं। अपना होना न भूल जाएं। चाहे पैदल चल रहे हों, कपड़े बदल रहे हों, स्नान कर रहे हों या खाना खा रहे हों। अपने होने को न भूलें। होता यह है कि हम भूल जाते हैं। हम हैं इसका खयाल जाते ही हम दूसरे चक्करों में उलझ जाते हैं। जब हम रात को सपना देखते हैं तो सपने में जो घट रहा होता है उससे हम जुड़ जाते हैं। कभी-कभी तो परेशान हो जाते हैं, चौंककर नीन्द खुल जाती है, परन्तु दिनभर जागते हुए हमें हम हैं इस बात का खयाल रहे तो रात को सपने में हम जुड़ेंगे नहीं और सपना सपना ही रहेगा जबकि हम सपने में धोखा खा जाते हैं। सपना यथार्थ लगने लगता है।शाहशुजा करमानी ऊंचे दर्जे के फकीर थे। वे ४० साल नहीं सोए। उनके बारे में कहते हैं नीन्द जब उन्हें परेशान करती तो आंखों में नमक का सुरमा लगा लेते। एक दिन ४० साल बाद जब सोए तो सपने में अल्लाह के दीदार हो गए। शाहशुजा ने कहा अर्से से आपको ढूंढ रहा था जागते हुए और अब आप मिले हो तो ख्वाब में। अल्लाह ने जवाब दिया यह तेरे जागने का ही नतीजा है। इसके बाद शाहशुजा आमतौर पर इसलिए नीन्द निकाला करते थे कि नीन्द में अल्लाह के दर्शन हो जाएंगे। अपने सपनों के सद्उपयोग का यह उदाहरण है। यदि हमें होश है कि हम हैं तो हम सपने को यथार्थ नहीं मानेंगे। और यह दुनिया का जो यथार्थ है इसे सपना समझ कर जी लेंगे। इसी में जिन्दगी का अमन और खैरियत है।

शिक्षा वो जो शांति दे


शिक्षा प्रणाली में गलाकाट स्पर्धा अब चिंता का राष्ट्रीय मुद्दा हो गई है। नई पीढ़ी नंबरों की दौड़ और रैंक की होड़ में लगा दी गई है। माता-पिता बिना बच्चे की मानसिक स्थिति को समझे उसे नंबरों की अंधी दौड़ में दौड़ा रहे हैं। आधुनिक शिक्षा प्रणाली से ततकलीक प्रतिभाएं तो पैदा हो रही हैं लेकिन इस पीढ़ी का भविष्य क्या होगा अब इस पर चिंतन करना जरूरी है। नई पीढ़ी अब पूरी तरह भौतिकता के पीछे है, जीवन का दर्शन बदल गया है और सबसे बड़ा नुकसान जो हुआ है वह यह कि इस पीढ़ी के भीतर एक अंशाति है। सारे सुख, विलासिता के साधनों के बावजूद इनके पास शांति नहीं है। शिक्षा के विस्तार को इस युग में खूब लाभ मिला परंतु एक हानि भी हुई कि पढ़े-लिखे लोग अशांत हो गए। आज की शिक्षा सेवा का माध्यम होना थी जो शोषण का कारण बनती गई। ये केवल शिक्षा के खतरे हैं। देवलोकवासी आचार्य श्रीराम शर्मा कहा करते थे केवल शिक्षा ही नहीं विद्या की भी आवश्यकता है। शिक्षा केवल बाहरी जानकारी दे रही है और विद्या भीतरी अनुभूतियां कराती है। शिक्षा संस्थानों, पुस्तकों और अन्य तकनीकी माध्यमों से प्राप्त होती है किंतु विद्या का आरंभ होता है मौलिक चिंतन से। शिक्षा केवल विचार देती है और विद्या विचार को आचार से जोड़ती है। शिक्षा के लिए खूब शिक्षक मिल जाएंगे लेकिन विद्या के लिए गुरु ढूंढऩा पड़ेगा। विद्या कहती है थोड़ा संयम साधो, आज के युग में निजी आवश्यकताओं और महत्वाकांक्षाओं को संभालना ही संयम है और सद्कार्य, सद्भाव का विस्तार करना ही सेवा है। विद्या अपने साथ संयम और सेवा लाती है। किंतु केवल शिक्षा लूट और शोषण करना सिखा रही है। केवल शिक्षा ने लोगों की खोपड़ी और जेब भर दी पर निजी व्यक्तित्व को खोखला कर दिया। मात्र शिक्षा लोगों की आदतें बना देती है और विद्या स्वभाव तैयार करती है। आदतें ध्यान में बाधा हैं इसलिए शिक्षित पुरुष मेडिटेशन में मुश्किल से उतर पाता है। उसे विद्या का सहारा मिला और वह अधिक योग्य होकर ध्यान में उतर जाएगा। केवल शिक्षा खतरनाक है और केवल विद्या भी उपयोगी नहीं होगी। दोनों के संतुलन में जीवन का आनंद है। एक काम इसमें उपयोगी है जरा मुस्कुराइए....।

मित्रता भावों से हो, शक्ति या औहदे से नहीं

अधिकतर लोग मित्रता उनसे गांठ लेते हैं जिनके पास कोई पद हो, वैभव हो या शक्ति हो। यह रिश्ता बहुत महत्वपूर्ण होता है। लोग यह भूल जाते हैं कि जिससे मित्रता कर रहे हैं, उसके गुण क्या है, अमीर हो लेकिन अहंकारी, शक्तिशाली हो लेकिन आततायी, वैभवशाली हो लेकिन भोगप्रवृत्ति का हो तो ऐसे आदमी से दोस्ती करना निरर्थक ही नहीं कभी-कभी अपने लिए भी अपमान का कारण बन सकता है। मित्रता हमेशा भाव और समर्पण देख कर रहें, तभी आपके काम ठीक होंगे। अगर सोद्देश्य मित्रता भी है तो उसमें भी इन बातों का ध्यान रखना जरूरी है। श्रीराम को सुग्रीव व साथियों से इतनी जानकारी मिल गई थी कि सीता का अपहरण हुआ है। कोई राक्षस विमान से सीता को दक्षिण दिशा में ले गया है। मुद्दा था सीताजी की खोज। सुग्रीव ने श्रीराम को आश्वस्त किया था कि सब प्रकार करिहउँ सेवकाई। जेहि बिधि मिलिहि जानकी आई॥ ''मैं सब प्रकार आपकी सेवा करूंगा, जिस उपाय से जानकीजी आकर आपको मिले।ÓÓ श्रीराम से सुग्रीव की पहली ही मुलाकात में यह वार्तालाप हुआ था। श्रीराम के पास यह विकल्प था कि वे सीता शोध जैसे महत्वपूर्ण कार्य के लिए या तो सुग्रीव से मित्रता करें या बालि से। बालि उस समय बलशाली थे और राजा थे किंतु श्रीराम ने मैत्री सुग्रीव से की क्योंकि बालि अहंकारी थे और अनुचित, अन्याय के प्रति विरोध नहीं करते थे। एक और महत्वपूर्ण पक्ष यह था कि श्रीराम और सुग्रीव की मैत्री हनुमानजी ने करवाई थी। कीन्ही प्रीति कछु बीच न राखा। दोनों ने हृदय से प्रीति का कुछ भी अंतर नहीं रखा। यह श्रीराम की विशिष्टï शैली थी कि उन्होंने विवेक से सुग्रीव पर विश्वास किया। जिस पर विश्वास किया जाए, उसे पूरा अधिकार भी दिया जाए। श्रीराम ने सुग्रीव पर पूरा विश्वास कर अधिकार दिया कि वे सीता की खोज करें। इसी विश्वास की प्रेरणा का आधार था कि सुग्रीव ने अपनी पूरी ताकत सीता शोध में झोंक दी। अपनी सेवा से उन्होंने कहा था - राम काजु अरू मोर निहोरा। बानर जूथ जाहु चहुँ ओरा।। '' हे वानरों के समूह यह श्रीराम का कार्य है और मेरा अनुरोध है तुम चारों ओर जाओ।ÓÓ श्रीराम ने सुग्रीव को निर्णय लेने का अधिकार दिया और सुग्रीव उस पर खरे उतरे। सीता की खोज हुई और लक्ष्य की प्राप्ति।

शनिवार, जनवरी 15, 2011

शब्द संवारते हैं हमारा व्यक्तित्व

कहते हैं सृष्टि की रचना शब्द से हुई है। कोई ब्रह्मनाद इस ब्रह्मांड में गूंजा, फिर उसने रूप धरना शुरू किया। शब्दों में बड़ी शक्ति होती है, हम जब भी कुछ कहें, यह समझकर कहें कि वे हमारे बोले गए शब्द क्या प्रभाव पैदा करेंगे। शब्द हमारा व्यक्तित्व और विचार दोनों बनाते हैं, हमारे भीतर क्या गूंज रहा है, हमारा व्यक्तित्व इसी पर निर्भर करता है। जो शब्द हमारे अंदर हमेशा नाद करते रहते हैं, हम स्वयं भी वैसे ही हो जाते हैं। जिस इंसान के मन में परमात्मा के शब्द गूंज रहे हों, उसे हर जगह केवल परमात्मा की तलाश ही होती है, किसी के मन में हमेशा भौतिक इच्छाओं की आवाज उठती रहती है, सो उसे भौतिक और दैहिक सुख की ही तलाश होती है। शरीर सद्कर्मों और मन सद्विचारों से संवरेगा। सद्विचार संवरते हैं सिमरन से, सिमरन के लिए शब्द-नाम की ताकत चाहिए। नाम महिमा के लिए गुरुनानक देव ने कहा है शब्दे धरती, शब्द अकास, शब्द-शब्द भया परगास। सगली सृस्ट शब्द के पाछे, नानक शब्द घटे घट आछे।। इस शब्द ने धरती, सूर्य, चंद्रमा सारी दुनिया पैदा की है। यही शब्द सबके भीतर अपनी धुनकारें दे रहा है। इस नाम की खोज की जाए जो सबके भीतर है। सभी संत-फकीरों ने अध्यात्म को समझाने के लिए अपने-अपने शब्द दिए हैं जो बाद में नाम-वंदना बन गए। गुरुनानक साहिब ने इसे गुरुवाणी, सच्चीवाणी, अकथ-कथ, हुकम, हरि कीर्तन कहा। ऋषि मुनियों ने इसे कभी आकाशवाणी कहा तो कभी रामधुन। चीनी गुरुओं ने ताओ, मुस्लिम फकीरों ने कलमा, बांगें आसमानी, कलामे इलाही, बताया। ईसा मसीह इसे लोगास बता गए। लेकिन फकीरों ने जो नाम शब्द बताया है इसे हम केवल ऐसे शब्दों से न जोड़ लें जो जुबान से निकलते हैं। यह नाम शब्द एहसास का मामला है। हमारे शरीर के भीतर नाम अपनी अनुभूति रखते हैं।जब हम ध्यान करते हैं तो ये नाम या गुरुमंत्र केवल बोलने के शब्द बनकर नहीं बल्कि सुमिरन ध्यान में अपना नाद देते हैं, गूंज ध्वनि देते हैं। यह भीतरी अनुगूंज हमें गहरे ध्यान में उतारती है। कई लोगों को तो गुरुनानक साहिब के वाहे गुरु संबोधन ने भी ध्यान में उतार दिया। यह नाम जप एक पुकार बन जाता है। परमात्मा को पाने के लिए हम जब आतुर होते हैं और उस आतुरता में जो शब्द उच्चारित होते हैं वे नाम जप बन जाते हैं। शिक्षा पद्धति में विषय की पुनरावृत्ति एक विधि है, जिसे रिवीजन लर्निंग कहते हैं। ऐसे ही अध्यात्म के अभ्यास में जप लर्निंग है। निरंतरता बनाए रखिए एक दिन परमात्मा आपको उपलब्ध होगा।

अभाव में जीना सीखें, आनंद अपनेआप मिलेगा

दुनिया सुखों के पीछे दौड़ रही है। हर कोई सबकुछ पाने की होड़ में लगा है। सौ फीसदी सफलता से कम तो किसी को मंजूर ही नहीं है। हम खुद भी ऐसे हैं और बच्चों को भी इसी दौड़ में जुटा दिया है। हर सुख, सारी सुविधा और दुनियाभर का वैभव हर एक ही दिली तमन्ना हो गई है। एक चीज का अभाव भी बर्दाश्त नहीं है, थोड़ी सी असफलता हमें तोड़ देती है। लेकिन इसके बाद भी जो नहीं मिल रहा है, वो है आनंद। दरअसल यह आनंद सबकुछ पा लेने में नहीं है। कभी-कभी अभाव में जीना भी आनंद देने लगता है। अगर आपके भीतर कोई अभाव है तो उसे सद्गुणों से भरने का प्रयास करें, महत्वाकांक्षाओं को हावी न होने दें। मन चाहा मिल जाए इसके लिए तेजी से दौड़ रही है दुनिया। न मिलने का विचार तो लोगों को भीतर तक हिला देता है। संतों ने बार-बार कहा है जो है उसका उपयोग करो तथा जो नहीं है उसे सोच-सोच कर तनाव में मत आओ। हम जो नहीं है उसे हानि मानकर जो है उसका भी लाभ नहीं उठा पाते हैं। आज अभाव की बात की जाए। संतों के पास यह कला होती है कि वे अभाव का भी आनंद उठा लेते हैं। हमारे लिए दो उदाहरण काफी है। श्रीराम वनवास में पूरी तरह से अभाव में थे। जिनका कल राजतिलक होने वाला था उन्हें चौदह वर्ष वनवास जाना पड़ा। इधर रावण के पास ऐसी सत्ता थी जिसे देख देवता भी नतमस्तक थे। एक के पास सबकुछ था फिर भी वह हार गया और दूसरे ने पूर्ण अभाव में भी दुनिया जीत ली। अभाव हमें संघर्ष के लिए प्रेरित करे, कुछ पाने के लिए प्रोत्साहित करे यहां तक तो ठीक है परन्तु हम अभाव में बेचैन हो जाते हैं और परेशान, तनाव ग्रस्त मन लेकर कुछ पाने के लिए दौड़ पड़ते हैं तब क्रोध, हिंसा, भ्रष्ट आचरण हमारे भीतर कब उतार जाते हैं पता ही नहीं चल पाता है।इसे एक और दृष्टि से देख सकते हैं। रावण में भक्ति का अभाव था बाकी सब कुछ था उसके पास। कई लोगों के साथ ऐसा होता है। आदमी अपने अन्दर के अभाव को भरने की कोशिश भी करता है। रावण ने भक्ति के अभाव को अपने अहंकार से भरा था, आज भी कई लोग अपने अभाव को अपनी महत्वाकांक्षा विकृतियों, दुर्गुणों से भरने लगते हैं। जिन्हें भक्ति करना हो वे समझ लें पहली बात अभाव का आनंद उठाना सीखें और अभाव को भरने के लिए लक्ष्य, उद्देश्य पवित्र रखें।

योग्यता हमेशा रहेगी, अपना भोलापन संभाले रखें

आज के दौर में योग्यता तो कई लोगों में मिल जाती है लेकिन सहजता या कह लें भोलापन कम ही लोगों में मिलता है। आजकल भोले इंसान को बेवकूफ या बुद्धू भी कह दिया जाता है। लोग उसे हंसी का पात्र बना देते हैं। दरअसल भोलापन एक दुर्लभ गुण है, इस गुण के होने से आदमी में जो खास बात आ जाती है वह यह कि वह भेदभाव भूल जाता है, अहंकार से दूर हो जाता है। हमारे दो देवताओं में यह गुण समान है, पहले भगवान शिव और दूसरे बाबा हनुमान। दोनों परम शक्तिशाली, ज्ञानी और पराक्रमी हैं लेकिन दोनों के स्वभाव में भोलापन हैं। हमें इस गुण को साधने का प्रयास करना चाहिए, हम सहज हो जाएंगे। शब्द ज्ञान तो बढ़ा देते हैं लेकिन ध्यान को बाधित कर देते हैं। श्रीहनुमानचालीसा दुनिया में खूब बोली जा रही ऐसी पंक्तियां है जो आपको मौन में उतार देंगी और यहीं से ध्यान, मेडिटेशन घटेगा। इसकी छठवीं चौपाई शंकर सुवन केसरी नंदन तेज प्रताप महाजग बंदन को लेकर पंडितों का अलग-अलग मत है। आईए आज शब्द तथा अनुभूति को समझा जाए। कुछ विद्वान कहते हैं शंकर सुवन का अर्थ है हनुमानजी स्वयं शंकर हैं और अन्य का मत है। वे शंकरजी के बेटे हैं। जो पुत्र मानते हैं उनके पास शिवपुराण में व्यक्त हनुमत जन्म कथा का आधार है और स्वयं शंकर हैं ऐसा मानने वाले विनय पत्रिका में प्रकाशित एक क्षेपक कथा का प्रमाण देते हैं। दोहावली तथा आनंद रामायण के प्रसंगों की चर्चा भी की जाती है। सच तो यह है कि हनुमानजी के जन्म की सात-आठ कथाएं हैं। इस कारण भी मान्यता में भेद आना स्वाभाविक है। सुवन शब्द को पकड़कर हम शोध में तो पहुंच सकते हैं, पर भक्ति में नहीं उतर पाएंगे। शंकर सुवन पंक्ति में जो अनुभूति है मात्र शब्द शोध से खोखली हो जाएगी। हमें वहां जाना होगा जहां इनका आरंभ हुआ था। शंकर सुवन लिखते समय तुलसीदासजी का भाव था हनुमानजी को शंकरजी के भोलेपन से जोडऩा। क्योंकि इसी की अगली पंक्ति में लिखा है तेज प्रताप महा जग बंदन। तेजस्वी और प्रतापवान यदि भोलेपन से भरा हो तो वह हनुमान होता है। आज के दौर में जब भोलापन मूर्खता और सरलता बेवकूफी मान ली गई हो तब तुलसी की यह मांग बड़ी जरूरी है कि हनुमान भक्त भोलापन बचा कर रखें। योग्यता और भोलापन मणिकांचन योग है। आज के योग्य लोगों को देख भगवान से यह सवाल पूछने की इच्छा होती है प्रभु, क्या आप वह फर्मा कहीं रख कर भूल गए हो जिसमें भोले और भले लोग तैयार किए जाते थे।