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शनिवार, जनवरी 15, 2011

बाहरी आवरण, भीतरी गुणों सा ही हो

यह दिखावे का दौर है, व्यक्ति का महत्व उसके गुणों से नहीं बल्कि उसके बाहरी आवरण से आंका जा रहा है। हम व्यक्तित्व परखते समय केवल बाहरी आवरण यानी कपड़ों और आभूषणों पर टिक जाते हैं। अच्छे कपड़े, आभूषण और सुंदर बनाव-शृंगार हो तो व्यक्तित्व आकर्षित करता लेकिन हम उसके भीतर झांकना भूल जाते हैं। आध्यात्मिक शांति की यात्रा में पहनावा भी एक बड़ा कारण हो सकता है। हम स्वभाव से क्या हैं और हमारे ऊपर का आवरण क्या है? अगर आध्यात्मिक शांति की तलाश है तो हमें बाहर और भीतरी आवरण में समानता लानी होगी। हमारा पहनावा भी हमें भीतर तक प्रभावित और परिवर्तित कर सकता है। क्या पहना जाए इसे लेकर कई लोग दिनभर परेशान रहते हैं। यदि आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो बात केवल कपड़ों की नहीं की जा रही है। हम एक ऐसा आवरण पहन लेते हैं जिसमें पता नहीं लग पाता कि हम भीतर से कुछ और हैं बाहर से कुछ और हैं। सबसे अच्छा ड्रेस कोड यह है कि हम जैसे भीतर हों वैसे ही बाहर रहें। छल के वस्त्र परमात्मा को पसंद नहीं आते। वस्त्रों की योग्यता उसकी उपयोगिता में होती है। किस वस्त्र का किस समय कितना उपयोग किया जाए यह समझदारी कहलाती है। यह समय उपभोक्ता युग है। कपड़े बनाने वाले सावधान हैं कि उपभोक्ता को कैसे कपड़े चाहिए, किन्तु पहनने वाले लापरवाह हैं। वस्त्रों के उपयोग का एक उदाहरण रामायण में अनसूया-सीता भेंट प्रसंग में आता है। श्रीराम, लक्ष्मण और सीता के साथ दंडकारण्य में ऋषि-मुनियों की राक्षसों से रक्षा के लिए पहुंचे हैं। वहां वे ऋषि दंपत्ति अत्रि-अनसूया से मिलते हैं। अनसूया वन-जीवन की आवश्यकताओं को समझते हुए सीता को ऐसे वस्त्र और आभूषण भेंट करती हैं जो कभी मैले नहीं होते और जिन्हें साफ करने की आवश्यकता नहीं होती। दिव्य बसन भूषन पहिराए। जो नित नूतन अमल सुहाए॥कह रिषिबधू सरस मृदु बानी। नारिधर्म कछु ब्याज बखानी॥ उन्हें (सीता को) ऐसे दिव्य वस्त्र और आभूषण पहनाए, जो नित्य नए निर्मल और सुहावने बने रहते हैं। प्राकृत वस्त्राभूषण में तीन दोष होते हैं। वे पुराने, मलिन और शोभाहीन हो जाते हैं। ये दिव्य वस्त्र इन दोषों से रहित थे। अयोध्या से वनगमन से निकलते समय श्रीराम ने सीता को कहा था - अपने हार आदि आभूषण गुरुपत्नी अरुंधती को दे दो। वन में सीता क लिए जो वस्त्र-आभूषण उपयोगी थे, वही अनसूया ने उन्हें दे दिए थे।जब हम पहनावे की बात करें तो पहले भीतरी पहनावे यानी हमारे स्वभाव और गुणों को सुधारें, बाहरी आवरण स्वत: ही आकर्षित करने लगेगा।

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