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बुधवार, जनवरी 12, 2011

मन खुद ही है एक रोग


आज कल मानसिक रोगों की खूब चर्चा होती है। थोड़ा गहरे में जाएं तो पता चलेगा मन के रोग नहीं रहते, मन खुद ही एक रोग होता है। मन जब हावी होता है तो मनुष्य का किसी एक काम में रूचि नहीं होती। संशय, निराशा और अकारण थकान से मन अपना प्रभाव जमाता है। ऐसे लोग जब कोई काम करते हैं तो आधे मन से करते हैं और तब आधा मन दूसरे काम की खोज में लग जाता है। इसे कहते हैं डावांडोली। यह हड़बड़ाहट मनुष्य को अकेलेपन का एहसास कराने लगती है। यह असंतुलन किसी को भी न तो भौतिक प्रगति करने देता है और न ही आध्यात्मिक उन्नति। ऐसे लोग कभी अधिक उत्तेजना में होंगे तो कभी घोर निराशा में। हमारे पास दुनिया में अलग-अलग दायित्व होते हैं। एक ही समय में कई काम हाथ में लेना पड़ते हैं। पहले का परिणाम आने को रहता है लेकिन तब तक दूसरा शुरू करना पड़ता है। इस चक्कर में कभी-कभी उत्साह और उतावलेपन का फर्क खत्म होने लगता है। परिणाम का विलंब बेचैन और अधीर बना देता है। इसलिए जब भी कोई काम करें सर्वप्रथम अपने मन पर नियंत्रण कर लें। कर्म को पकने में समय लगता ही है। इस दौर में मन काम दिखा देगा, इतनी उठापटक कर देगा कि हमें कर्म से ही भय और उचाट हो जाती है। फिर वर्तमान में तो सारा लालन-पालन, शिक्षा-दीक्षा, नौकरी-धंधा सबकुछ तेजी से सिखाए जाने पर जोर देता है। फटाफट और संक्षेप जैसे गुण भी कब अधीरता जैसे दुर्गुण का रूप ले लेंगे पता नहीं चलता। इसलिए मलूकदास नामक फकीर की बात याद रखें कोई भी काम शुरू करने के पहले मन में भाव लाएं-कह मलूक हम जबहिं ते लीन्ही हरि की ओट जब से परमात्मा की ओट, आड़, सुरक्षा लेने का निर्णय लिया है, बिना बेचैनी के सफलता मिलेगी और टिकेगी भी।

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