लेबल

peace

रविवार, जनवरी 16, 2011

खुद में रहें, दूसरों में न उलझें

अक्सर लोग दुनियादारी में इतने उलझ जाते हैं कि खुद को ही भूल जाते हैं। खुद का ख्याल नहीं होना भी परेशानी देता है। लोग खुद का ध्यान नहीं रखते, दूसरे क्या कर रहे हैं, वे कहां पहुंच रहे हैं, इसी में उनकी जिंदगी गुजर जाती है। यह शरीर, आत्मा हमारी है, हम जब भी कोई काम करें तो उसमें खुद को रखें। ये दुनिया ऊपर वाले का ख्वाब है, परमात्मा की माया है। भगवान जब सपने देखता है तो दुनिया का निर्माण हो जाता है। यह एक सूफी खयाल है। इसी तरह जब हम दुनिया में रहें और यदि हमें यह बात समझ में आ जाए कि है तो परमात्मा का सपना फिर भी सच है और हम इस सच का हिस्सा हैं। इसीलिए इस्लाम में, सूफी परम्परा में एक प्रयोग किया गया है कि जो भी काम हम करें उसमें अच्छी तरह खयाल रखें कि हम हैं। अपना होना न भूल जाएं। चाहे पैदल चल रहे हों, कपड़े बदल रहे हों, स्नान कर रहे हों या खाना खा रहे हों। अपने होने को न भूलें। होता यह है कि हम भूल जाते हैं। हम हैं इसका खयाल जाते ही हम दूसरे चक्करों में उलझ जाते हैं। जब हम रात को सपना देखते हैं तो सपने में जो घट रहा होता है उससे हम जुड़ जाते हैं। कभी-कभी तो परेशान हो जाते हैं, चौंककर नीन्द खुल जाती है, परन्तु दिनभर जागते हुए हमें हम हैं इस बात का खयाल रहे तो रात को सपने में हम जुड़ेंगे नहीं और सपना सपना ही रहेगा जबकि हम सपने में धोखा खा जाते हैं। सपना यथार्थ लगने लगता है।शाहशुजा करमानी ऊंचे दर्जे के फकीर थे। वे ४० साल नहीं सोए। उनके बारे में कहते हैं नीन्द जब उन्हें परेशान करती तो आंखों में नमक का सुरमा लगा लेते। एक दिन ४० साल बाद जब सोए तो सपने में अल्लाह के दीदार हो गए। शाहशुजा ने कहा अर्से से आपको ढूंढ रहा था जागते हुए और अब आप मिले हो तो ख्वाब में। अल्लाह ने जवाब दिया यह तेरे जागने का ही नतीजा है। इसके बाद शाहशुजा आमतौर पर इसलिए नीन्द निकाला करते थे कि नीन्द में अल्लाह के दर्शन हो जाएंगे। अपने सपनों के सद्उपयोग का यह उदाहरण है। यदि हमें होश है कि हम हैं तो हम सपने को यथार्थ नहीं मानेंगे। और यह दुनिया का जो यथार्थ है इसे सपना समझ कर जी लेंगे। इसी में जिन्दगी का अमन और खैरियत है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें