
शिक्षा प्रणाली में गलाकाट स्पर्धा अब चिंता का राष्ट्रीय मुद्दा हो गई है। नई पीढ़ी नंबरों की दौड़ और रैंक की होड़ में लगा दी गई है। माता-पिता बिना बच्चे की मानसिक स्थिति को समझे उसे नंबरों की अंधी दौड़ में दौड़ा रहे हैं। आधुनिक शिक्षा प्रणाली से ततकलीक प्रतिभाएं तो पैदा हो रही हैं लेकिन इस पीढ़ी का भविष्य क्या होगा अब इस पर चिंतन करना जरूरी है। नई पीढ़ी अब पूरी तरह भौतिकता के पीछे है, जीवन का दर्शन बदल गया है और सबसे बड़ा नुकसान जो हुआ है वह यह कि इस पीढ़ी के भीतर एक अंशाति है। सारे सुख, विलासिता के साधनों के बावजूद इनके पास शांति नहीं है। शिक्षा के विस्तार को इस युग में खूब लाभ मिला परंतु एक हानि भी हुई कि पढ़े-लिखे लोग अशांत हो गए। आज की शिक्षा सेवा का माध्यम होना थी जो शोषण का कारण बनती गई। ये केवल शिक्षा के खतरे हैं। देवलोकवासी आचार्य श्रीराम शर्मा कहा करते थे केवल शिक्षा ही नहीं विद्या की भी आवश्यकता है। शिक्षा केवल बाहरी जानकारी दे रही है और विद्या भीतरी अनुभूतियां कराती है। शिक्षा संस्थानों, पुस्तकों और अन्य तकनीकी माध्यमों से प्राप्त होती है किंतु विद्या का आरंभ होता है मौलिक चिंतन से। शिक्षा केवल विचार देती है और विद्या विचार को आचार से जोड़ती है। शिक्षा के लिए खूब शिक्षक मिल जाएंगे लेकिन विद्या के लिए गुरु ढूंढऩा पड़ेगा। विद्या कहती है थोड़ा संयम साधो, आज के युग में निजी आवश्यकताओं और महत्वाकांक्षाओं को संभालना ही संयम है और सद्कार्य, सद्भाव का विस्तार करना ही सेवा है। विद्या अपने साथ संयम और सेवा लाती है। किंतु केवल शिक्षा लूट और शोषण करना सिखा रही है। केवल शिक्षा ने लोगों की खोपड़ी और जेब भर दी पर निजी व्यक्तित्व को खोखला कर दिया। मात्र शिक्षा लोगों की आदतें बना देती है और विद्या स्वभाव तैयार करती है। आदतें ध्यान में बाधा हैं इसलिए शिक्षित पुरुष मेडिटेशन में मुश्किल से उतर पाता है। उसे विद्या का सहारा मिला और वह अधिक योग्य होकर ध्यान में उतर जाएगा। केवल शिक्षा खतरनाक है और केवल विद्या भी उपयोगी नहीं होगी। दोनों के संतुलन में जीवन का आनंद है। एक काम इसमें उपयोगी है जरा मुस्कुराइए....।
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