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शनिवार, जनवरी 15, 2011

अगर पाने की चाह है तो खोने से न डरें

हम दुनिया का हर सुख चाहते हैं लेकिन अगर एक भी चीज खोनी हो तो हम सहम जाते हैं, डर जाते हैं। परमात्मा ने इस संसार को रचा, तो नियम ही कुछ ऐसा बनाया कि हमें बिना मूल्य चुकाए कोई चीज मिल ही नहीं सकती है। और अगर बात खुद परमात्मा को पाने की है तो उसके लिए ऐसा मूल्य भी चुकाना पड़ेगा। परमात्मा को पाना है तो खुद की पहचान खोनी होगी। हर इंसान को अपनी पहचान से बड़ा मोह होता है, लेकिन जब परमात्मा से मिलना हो तो फिर उसी का होकर मिलना पड़ता है।हर उपलब्ध वस्तु का अपना एक मूल्य होता है। जो लोग परमात्मा को पाना चाहते हैं उन्हें अच्छा खासा मोल चुकाने की तैयारी रखना होगी। सच तो यह है कि ईश्वर जैसी महान हस्ती को पाने के लिए एक बड़ा मूल्य चुकाना होगा और वह है खुद ही को खो देना। कोई यह सोचे कि यह सत्ता थोड़े से धन से, सम्पत्ति से या मान देने से मिल जाएगी तो यह भ्रम होगा। खुद ही को खर्च किए बिना परमात्मा नहीं मिलेगा। अपने निज का दांव लगाना पड़ेगा, अपनी ही आहूति देना पड़ेगी। हनुमानजी का उदाहरण लें। जब तक उनके जीवन में श्रीराम नहीं आए थे वे केसरी के बेटे के रूप में तथा सुग्रीव के सचिव के रूप में जाने जाते थे। जैसे ही श्रीराम उनके जीवन में आए हनुमानजी ने अपनी सारी पहचान समाप्त कर दी और पूरी तरह राममय हो गए। श्रीराम जितने हनुमान को मिले उतने शायद ही किसी को मिले होंगे। कारण वही था हनुमानजी ने स्वयं को पूरा खो दिया था और खुद को खोने के बाद जो मिला वह अनमोल है। हनुमानजी इसीलिए सभी धर्मों में प्रिय हैं। हर संप्रदाय का व्यक्ति वायु का उपयोग करता है और हनुमानजी वायु के देवता हैं। कोई सा भी धर्म हो उस परमसत्ता तक पहुंचने के लिए सिद्धांत सबके एक ही होंगे। समझदार भक्त किसी भी धर्म के हों अपने सम्प्रदाय को मार्ग की तरह उपयोग करते हैं और मंजिल पर पहुंचने पर मार्ग को छोड़ देते हैं। जो नासमझ हैं वह मार्ग पर ही टिक जाते हैं। संप्रदाय एक मार्ग है। अब मार्ग या संप्रदाय का क्या दोष, वह तो लोग गलत उपयोग करते हैं इसलिए संप्रदाय शब्द बदनाम हो गया। यह तो वाहन की तरह है। हम वाहन का उपयोग करने के बाद उसको छोड़ देते हैं अपने ऊपर ढोते नहीं। यदि कोई वाहन को ढोए तो इसमें वाहन की क्या गलती। संप्रदाय भी इसी तरह है। हनुमानजी अपने चरित्र से यही बताते हैं कि उस परम सत्ता को पाने के लिए विलीन हो जाओ और ऐसी अवस्था में धर्म और संप्रदाय आड़े नहीं आएंगे। आपको वह परम सत्ता उपलब्ध हो जाएगी जिसके लिए आप संसार में आए हैं।

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