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मंगलवार, जनवरी 11, 2011

मन इतना बेचैन क्यों रहता है?



हर उम्र की जिज्ञासा हर बार अलग नतीजे देती है। जो जिज्ञासा बचपन में होती है जवानी में उसके अर्थ बदल जाते हैं। जैसे घड़ी का लटकता हुआ पेंडुलम इधर से उधर घूमता है वैसे ही मन मूवमेंट करता है और इसकी हर गतिविधि के साथ जिज्ञासा के दृष्टिकोण बदल जाते हैं।
जब घड़ी का पेंडुलम सीधे हाथ से उल्टे हाथ की ओर जाता है दरअसल इसी समय वह उल्टे हाथ से सीधे हाथ की ओर आने की तैयारी भी कर रहा होता है। यही हाल मन के हैं। इसलिए बच्चों के लालन-पालन में मन को एक अलग सावधानी से पकडऩा होगा। मन का भोजन विचार हैं, इसलिए बालपन में संस्कारित विचार देना मन को स्वस्थ रखने जैसा है। जैसे बहुत छोटा बच्चा केवल दूध पीता है, अधिक अन्न उसके लिए हानिकारक है। ठीक यही हाल मन का होता है।
सावधान माता-पिता अपने बच्चों के हर उम्र के विचारों को खण्ड-खण्ड करके चलते हैं। उदाहरण के तौर पर छोटे बच्चे सोते समय महापुरुषों की प्रेरणादायक कथाएं सुनना चाहते हैं। एक उम्र के बाद इसका टेस्ट बदल जाता है लेकिन बचपन में यह प्रेरक कथाएं मन का भोजन बन ही जाना चाहिए, तब जाकर जवानी में मन इनको भी कभी-कभी याद करता रहेगा। उदाहरण के तौर पर बचपन में टीवी, इंटरनेट और सिनेमा ये तीनों मनोरंजन की आड़ में बच्चों का मनोदृष्टिकोण ही बदल देते हैं। इससे बच्चों की बुद्धि भले ही तेज हो जाए लेकिन नैतिकता दम तोडऩे लगेगी। बच्चों को इस तरह से बुद्धिमान बनाया जाए कि वे नैतिक-अनैतिक का भेद ठीक से समझ लें। इसीलिए हर उम्र की जिज्ञासा हर उम्र में सही तरीके से पूरी की जाना चाहिए।

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