परमात्मा को अनुभव करने का सबसे बेहतर रास्ता है प्रकृति। कहते हैं प्रकृति परमात्मा की प्रतिनिधि है। नदियां, पहाड़, जंगल, वनस्पति और जीव, सभी परमात्मा के प्रतिनिधि है। भारतीय मनीषियों ने इंसान को परमात्मा से जोडऩे के लिए प्रकृति के जरिए ही प्रयास करने के तरीके इजाद किए। ये तरीके ही हमारी संस्कृति में व्रत-त्योहार और उत्सव बनकर आए हैं। इन उत्सवों के मर्म को समझें, इसके आनंद को अनुभव करेंगे तो परमात्मा खुद आपको महसूस होने लगेगा।
परमात्मा ने मनुष्य को ही यह संभावना दी है कि वह अपनी चेतना को ऊपर उठा सकता है तब देव तुल्य बन जाएगा। चेतना का स्वभाव है यदि इसे ऊपर नहीं उठाया गया तो यह नीचे प्रवाहित होगी ही और तब पतन निश्चित है। अत: मनुष्य के पास यह मौका है कि वह दोनों ओर जा सकता है श्रेष्ठ पर भी, निकृष्ट पर भी। चेतना को यदि श्रेष्ठ पर ले जाना है तो एक तरीका यह भी है कि उसे प्रकृति से जोड़ें। प्रकृति परमात्मा की प्रतिनिधि है। ये तो हमारे पर्यावरण दोष ने हमें प्रकृति से दूर किया है और इसी कारण हम परमात्मा से भी बिछड़ गए हैं। भारतीय शास्त्रों ने कुछ त्यौहारों को अद्भुत रूप दिया है। ऐसा ही एक त्यौहार है गोवत्स द्वादशी। इस दिन गोपूजन का महत्व है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में गाय उसकी सच्ची प्रतिनिधि है। माना तो यहां तक गया है धरती को जो अमृत मिलता है वह गाय के दूध के रूप में मिलता है। हम जितना अधिक गाय को पूजेंगे समझ लीजिए उतना ही प्रकृति के प्रति सम्मान दर्शा रहे होंगे। यह कैसे संभव है कि कोई प्रकृति से प्रेम करे और गाय पर अत्याचार। गाय से जुडऩे का अर्थ है अपने अस्तित्व से अहंकार को मुक्त करना। हम बुद्धि और अहंकार से इतने अधिक भर गए हैं कि परमात्मा के लिए कोई स्थान रिक्त ही नहीं रहा। हिंदुओं के दो प्रमुख अवतार श्रीराम और श्रीकृष्ण ने प्रकृति के दो प्रतिनिधियों को अपनी लीला में विशेष स्थान दिया है। श्रीराम ने वानरों को तथा श्रीकृष्ण ने गायों को। मनुष्य का शरीर यदि बंदरों के शरीर का विकास है तो मनुष्य की आत्मा गाय की आत्मा का विकास है। यदि गाय की आंख में आंख डालकर आप ५ मिनट रुक जाएं तो आपका ध्यान लग जाएगा। परमात्मा की कृपा चाहिए तो प्रकृति का सम्मान करें।
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