यादें यानी स्मृतियां, हर किसी के साथ जुड़ी होती हैं। कुछ अच्छी तो कुछ दु:खद। आदमी की ये आदत होती है वह या तो भूतकाल की यादों में जीता है या भविष्य की कल्पना में। स्मृतियां आवश्यक भी है, लेकिन इनका सही उपयोग हो। हम यादों में खोकर समय न गवाएं बल्कि स्मृतियों से प्रेरणा का काम लें।
स्मृतियां आदमी को बना भी देती हैं और बिगाड़ भी देती हैं। कई लोग खयालों में खो कर बरबाद हो गए और अनेक लोग खयालों को सपने बनाकर उन्हें पूरे कर आबाद हो गए। बहुत सारी बातों को याद रखना स्मृति नहीं होता। जो भूलने लायक है उसे भूला दिया जाए और जो याद रखने लायक हो उसे याद रखा जाए। इस विवेक शक्ति का नाम स्मृति है। बेकार की बातों को याद रखने का अर्थ है बुद्धि पर अकारण बोझ डालना।
गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को इस दार्शनिक तथ्य से समझाया था कि ऐसे स्मृतियों के बोझ से दबी बुद्धि को फिर उन विषयों में आसक्ति हो जाती है। यहीं से बुद्धि की सामथ्यर्ता नष्ट होने लगती है।
संत फकीर इस कला को जानते हैं कि साधना पथ में स्मृतियों का कैसे उपयोग किया जाए। निरंकारी संप्रदाय के संस्थापक संत बूटासिंह नहीं भूलते थे कि वे कभी अपनी आजीविका चलाने के लिए अंग्रेज सैनिकों के शरीर पर विभिन्न जानवरों और कभी-कभी स्त्रियों के चित्र-आकृति गोदा करते थे। पेशावर से लेकर कई ब्रिटिश राजधानियों में वे यही काम करते थे, लेकिन शरीर पर गोदने का काम करते-करते वे लोगों की आत्मा को भी स्पर्श कर लेते थे। हाथों से काम शरीर पर गोदना था पर वाणी से चर्चा आध्यात्मिक किया करते थे। देखते ही देखते पश्चिमी भारत में उन्हें गुरु का दर्जा प्राप्त हो गया। १९४३ में देह छोडऩे वाले ये संत स्मृतियों के सद्पयोग का उदाहरण हैं।
अब दुरुपयोग भी देख लें। आज के समय में ऐसे अनेक संत, गुरुओं के आंतरिक अनुभवों को उनके शिष्य उपभोक्ता सामग्री बनाकर पेश कर रहे हैं। आज के दौर में गुरुओं के विचारों को शिष्य-भक्तगण अध्यात्म धर्म की मंडी में बेच दें यहां तक तो ठीक है, पर अब तो गुरु स्वयं ही प्रोडक्ट बनकर अपनी ही बोलियां लगवा रहे हैं। यह स्मृतियों का दुरुपयोग है।
peace
शनिवार, जनवरी 15, 2011
बुधवार, जनवरी 12, 2011
शांति के लिए यह संतुलन जरूरी है....

अति हमेशा नुकसान दायक है। यह नियम अच्छी और बुरी दोनों आदतों पर लागू होता है। ऋषि-मुनियों ने अति को वर्जित ही बताया है। बुद्ध ने एक शब्द दिया था मंझम मग्न यानी मध्यम मार्ग। जीवन का यह संतुलन उन्हें एक दिन वह सब दिला गया जिसके लिए उनकी पूरी तपस्या थी।
अपनी बोध प्राप्त की अवस्था में उनसे एक प्रश्न पूछा गया था जिसका उन्होंने बड़ा सुंदर उत्तर दिया था। किसी का प्रश्र था उनसे अब आपको क्या मिला? क्या वह प्राप्त हो गया जिसके लिए आपके सारे प्रयास थे? बुद्ध ने कहा- नया कुछ नहीं मिला, जो कुछ मेरे पास पहले से था, पाया ही हुआ था, पूर्व उपलब्ध था, उसका ज्ञान हो गया, पता चल गया उसका। वह दौलत अपने ही भीतर थी हम बाहर ढूंढ रहे थे।
जिसके कारण बाहर निकला, वो तो मेरे भीतर निकला। हम दो भूलें कर जाते हैं या तो बिल्कुल बाहर संसार पर टिक जाते हैं या एकदम भीतर उतर जाते हैं। ये अतियां हमारे लिए हमारे अध्यात्म की दुश्मन बन जाती हैं।
आचार्य श्रीराम शर्मा संसार में संतुलन से चलने के लिए एक अच्छा उदाहरण बताया करते थे। दुनिया में ऐसे चलो जैसे पानी में हाथी चलता है। हाथी जानता है पानी में जल्दबाजी करूंगा तो कीचड़ या गड्ढे में गिर सकता हूं। लिहाजा आगे और पीछे के पैर रखने में वह गजब का संतुलन बनाता है। बस, ऐसा ही संतुलन हमें बाहर और भीतर की यात्रा में रखना होगा।
जैसे ही हम संतुलन में आते हैं हमारी अंतर दृष्टि स्पष्ट हो जाती है और हम स्वयं को पहचान जाते हैं। स्वयं को जानते ही परमात्मा दिख जाता है। भगवान होना नहीं पड़ता, बस यह समझना पड़ता है कि हम हैं ही भगवान। जरा सा स्वयं का पता लगा और दुनिया बदली। इसीलिए संतुलन जरूरी है संयम की अति से।
मन खुद ही है एक रोग

आज कल मानसिक रोगों की खूब चर्चा होती है। थोड़ा गहरे में जाएं तो पता चलेगा मन के रोग नहीं रहते, मन खुद ही एक रोग होता है। मन जब हावी होता है तो मनुष्य का किसी एक काम में रूचि नहीं होती। संशय, निराशा और अकारण थकान से मन अपना प्रभाव जमाता है। ऐसे लोग जब कोई काम करते हैं तो आधे मन से करते हैं और तब आधा मन दूसरे काम की खोज में लग जाता है। इसे कहते हैं डावांडोली। यह हड़बड़ाहट मनुष्य को अकेलेपन का एहसास कराने लगती है। यह असंतुलन किसी को भी न तो भौतिक प्रगति करने देता है और न ही आध्यात्मिक उन्नति। ऐसे लोग कभी अधिक उत्तेजना में होंगे तो कभी घोर निराशा में। हमारे पास दुनिया में अलग-अलग दायित्व होते हैं। एक ही समय में कई काम हाथ में लेना पड़ते हैं। पहले का परिणाम आने को रहता है लेकिन तब तक दूसरा शुरू करना पड़ता है। इस चक्कर में कभी-कभी उत्साह और उतावलेपन का फर्क खत्म होने लगता है। परिणाम का विलंब बेचैन और अधीर बना देता है। इसलिए जब भी कोई काम करें सर्वप्रथम अपने मन पर नियंत्रण कर लें। कर्म को पकने में समय लगता ही है। इस दौर में मन काम दिखा देगा, इतनी उठापटक कर देगा कि हमें कर्म से ही भय और उचाट हो जाती है। फिर वर्तमान में तो सारा लालन-पालन, शिक्षा-दीक्षा, नौकरी-धंधा सबकुछ तेजी से सिखाए जाने पर जोर देता है। फटाफट और संक्षेप जैसे गुण भी कब अधीरता जैसे दुर्गुण का रूप ले लेंगे पता नहीं चलता। इसलिए मलूकदास नामक फकीर की बात याद रखें कोई भी काम शुरू करने के पहले मन में भाव लाएं-कह मलूक हम जबहिं ते लीन्ही हरि की ओट जब से परमात्मा की ओट, आड़, सुरक्षा लेने का निर्णय लिया है, बिना बेचैनी के सफलता मिलेगी और टिकेगी भी।
उन्नति करने के लिए जरूरत होती है आत्मबल की

संसार में उन्नति करने के लिए जिन बातों की जरूरत होती है उनमें से एक है आत्मबल। यदि मानसिक अस्थिरता है तो यह बल बिखर जाता है। इस कारण भीतरी व्यक्तित्व में एक कंपन सा आ जाता है। भीतर से कांपता हुआ मनुष्य बाहरी सफलता को फिर पचा नहीं पाता, या तो वह अहंकार में डूब जाता है या अवसाद में, दोनों ही स्थितियों में हाथ में अशांति ही लगती है। यह आत्मबल जिस ऊर्जा से बनता है वह ऊर्जा हमारे भीतर सही दिशा में बहना चाहिए। हमारे भीतर यह ऊर्जा या कहें शक्ति दो तरीके से बहती है। पहला विचारों के माध्यम से, दूसरा ध्यान यानी अटेंशन के जरिए। हम भीतर जिस दिशा में या विषय पर सोचेंगे यह ऊर्जा उधर बहने लगेगी और उसको बलशाली बना देगी। इसीलिए ध्यान रखें जब क्रोध आए तो सबसे पहला काम करें उस पर सोचना छोड़ दें। क्योंकि जैसे ही हम क्रोध पर सोचते हैं ऊर्जा उस ओर बहकर उसे और बलशाली बना देती है। गलत दिशा में ध्यान देने से ऊर्जा वहीं चली जाएगी। इसे सही दिशा में करना हो तो प्रेम जाग्रत करें। इस ऊर्जा को जितना भीतरी प्रेमपूर्ण स्थितियों पर बहाएंगे वही उसकी सही दिशा होगी। फिर यह ऊर्जा सृजन करेगी, विध्वंस नहीं। माता-पिता जब बच्चे को मारते हैं तब यहां क्रोध और हिंसा दोनों काम कर रहे हैं। बाहरी क्रिया में क्रोध-हिंसा है, परन्तु भीतर की ऊर्जा प्रेम की दिशा में बह रही होती है। माता-पिता यह क्रोध अपनी संतान के सृजन, उसे अच्छा बनाने के लिए कर रहे होते हैं। किसी दूसरे बच्चे को गलत करता देख वैसा क्रोध नहीं आता, क्योंकि भीतर जुड़ाव प्रेम का नहीं होता है। इसलिए ऊर्जा के बहाव को भीतर से चैक करते रहें उसकी दिशा सदैव सही रखें, तो बाहरी क्रिया जो भी हो भीतर की शांति भंग नहीं होगी।
...तो फिर पूरी होंगी आपकी सारी इच्छाएं

मूर्ति पूजा के दौरान अंध विश्वास और विवेक में संतुलन जरूरी है। देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के सामने मत्था टेकने से मनौति पूरी हो जाएगी, यह मान लेना अंधविश्वास है। लेकिन इसमें विवेक जुड़ते ही विश्वास नए रूप में सामने आएगा। महत्वपूर्ण यह कि मूर्ति में हम क्या देख रहे और उससे क्या ले रहे हैं।
हिन्दुओं ने मूर्ति में प्राणप्रतिष्ठा इसीलिए करवाई, बुद्ध तथा महावीर की मूर्तियां इसीलिए पूजी गई कि पाषाण में हम वो दर्शन कर लें जो हमारे व्यक्तित्व में अधूरा है। यदि विवेक दृष्टि सही है तो हमें जिस संबल की जरूरत है उसके दर्शन पत्थर की प्रतिमा में हो जाएंगे।जीसस कादस्त की बहुत की सुंदर मूर्ति बनाने वाले से किसी ने पूछा आप इतना सुंदर पत्थर कहां से लाए।
उस मूर्तिकार का जवाब था मैंने तो उस पत्थर को चुना जो चर्च बनाते समय रिजेक्ट कर दिया गया था। जिस पत्थर को फालतू समझकर नकारा गया उस बेकार को मैंने संवारा। क्योंकि जीसस की जो छवि उस मूर्तिकार के मन में थी वही उसने पत्थर में देखी। उसमें से बस आसपास का फालतू पत्थर हटाया तो प्रतिमा बाहर निकल आई। ऐसे ही जीवन में कई फालतू बातों को हम आसपास कर लेते हैं, उन्हें हटाया तो जो सार्थक है वह सामने आएगा। इसी भाव से मूर्ति पूजा की जाए तो प्रतिमाएं दिशा निर्देश, आत्मबल और आनंद का कारण बन जाएगी।
मंगलवार, जनवरी 11, 2011
मन इतना बेचैन क्यों रहता है?

हर उम्र की जिज्ञासा हर बार अलग नतीजे देती है। जो जिज्ञासा बचपन में होती है जवानी में उसके अर्थ बदल जाते हैं। जैसे घड़ी का लटकता हुआ पेंडुलम इधर से उधर घूमता है वैसे ही मन मूवमेंट करता है और इसकी हर गतिविधि के साथ जिज्ञासा के दृष्टिकोण बदल जाते हैं।
जब घड़ी का पेंडुलम सीधे हाथ से उल्टे हाथ की ओर जाता है दरअसल इसी समय वह उल्टे हाथ से सीधे हाथ की ओर आने की तैयारी भी कर रहा होता है। यही हाल मन के हैं। इसलिए बच्चों के लालन-पालन में मन को एक अलग सावधानी से पकडऩा होगा। मन का भोजन विचार हैं, इसलिए बालपन में संस्कारित विचार देना मन को स्वस्थ रखने जैसा है। जैसे बहुत छोटा बच्चा केवल दूध पीता है, अधिक अन्न उसके लिए हानिकारक है। ठीक यही हाल मन का होता है।
सावधान माता-पिता अपने बच्चों के हर उम्र के विचारों को खण्ड-खण्ड करके चलते हैं। उदाहरण के तौर पर छोटे बच्चे सोते समय महापुरुषों की प्रेरणादायक कथाएं सुनना चाहते हैं। एक उम्र के बाद इसका टेस्ट बदल जाता है लेकिन बचपन में यह प्रेरक कथाएं मन का भोजन बन ही जाना चाहिए, तब जाकर जवानी में मन इनको भी कभी-कभी याद करता रहेगा। उदाहरण के तौर पर बचपन में टीवी, इंटरनेट और सिनेमा ये तीनों मनोरंजन की आड़ में बच्चों का मनोदृष्टिकोण ही बदल देते हैं। इससे बच्चों की बुद्धि भले ही तेज हो जाए लेकिन नैतिकता दम तोडऩे लगेगी। बच्चों को इस तरह से बुद्धिमान बनाया जाए कि वे नैतिक-अनैतिक का भेद ठीक से समझ लें। इसीलिए हर उम्र की जिज्ञासा हर उम्र में सही तरीके से पूरी की जाना चाहिए।
यह चीज हमें असफलता से बचाएगी

सीधी सी बात है यदि खड़े रहना चाहते हैं तो धरती पर थोड़ी सी जगह चाहिए और यदि चलना चाहते हैं तो मार्ग। ये दोनों बातें जीवन में होती रहे इसके लिए अध्यात्म ने एक शब्द दिया है श्रद्धा। श्रद्धा(विश्वास ) जीवन की निरूद्देश्यता पर प्रतिबंध लगाती है।
बुद्ध ने एक जगह कहा था हमारी एक ऐसी प्रकृति होती है जो हिरण की कल्पना जैसी रहती है। हिरण को प्यास के दबाव के कारण रेगिस्तान में वहां पानी दिखता है जहां होता नहीं है। इसे मृग-मरीचिका कहा गया है। जो है नहीं उसे मान लेना, देख लेना। हमने परमात्मा के साथ ऐसा ही किया। वह बैठा है भीतर हम ढूंढ रहे हैं बाहर। जहां नहीं है वहां ढूंढने पर एक नुकसान यह होता है कि जहां वह है वहां हम नहीं पहुंच पाते।
इस मामले में बुद्ध जैसे संत तो और गहरे निकल गए। वे कहते हैं जिसे तुमने खोया ही नहीं उसे क्या ढूंढना। उसका हमारे भीतर होना ही पर्याप्त है। खोजने की जगह महसूस करना ज्यादा महत्वपूर्ण है। ऊपर वाला जब भी किसी इन्सान को धरती पर भेजता है तो स्वयं को उसमें स्थापित करके ही भेजता है। मैन्यू फेक्चरिंग डिफेक्ट जैसा काम उसके यहां नहीं होता।
वह पहली पैदाईश से ही कम्पलीट उतारता है। संसार में आते ही अबोध होते में गड़बड़ हमारे लालन-पालन करने वाले और होश संभालते ही हम स्वयं शुरु करते हैं। अपने भीतर बेहतर जोडऩे से ज्यादा अच्छा घटाने का काम हम ही शुरु कर देते हैं। ऐसे में श्रद्धा(विश्वास) वह तत्व है जो मृग मरीचिका की वृत्ति से हमें बचाएगी।
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