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बुधवार, जनवरी 19, 2011

सिर्फ बड़े होने से नहीं आता बड़प्पन - Greatness comes not only from large - religion.bhaskar.com

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पहले ये समझें कि हम क्या हैं - Before they understand what we are - religion.bhaskar.com

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अनुशासन और अनिवार्यता में फर्क समझें

अनुशासन के नाम पर कई लोग बेमतलब या गैर-जरूरी बातों को भी अनिवार्यता बना लेते हैं। अगर जरूरत से ज्यादा नियमों को पाला जाए तो वे भी शांति को भंग कर देते हैं। जीवन में कुछ समय खुद को अनुशासन या कहिए सांसारिक सिद्धांतों से मुक्त रखिए। आध्यात्मिक शांति के लिए यह बहुत जरूरी है कि आप पर कोई अनावश्यक दबाव न हो। मन प्रसन्न हो, दिमाग पर बोझ न रहे।




जीवन में अनुशासन हो यह बात तो समझ में आती है लेकिन जीवन में बातों की अनिवार्यता हो जाए तो फिर अशांति का जन्म होता है। अनिवार्यता का अर्थ है ऐसा होना ही चाहिए का आग्रह। आध्यात्मिक जीवन, मुक्त जीवन होता है। सारे काम मनुष्य करता है फिर भी उसे यह बोध रहता है कि मैं नहीं कर रहा। बहुत कुछ हो रहा है और उस होने से जितना हम स्वीकृत हैं उतना ही शांत होते जाएंगे। ध्यान रखें इसका अकर्मण्यता से कोई लेना-देना नहीं है। सारा मामला है सहजता का। आप सहज हुए कि मुक्त हुए। अभी हम मुक्त नहीं हैं अभी हम बंधे हुए हैं और वह भी दूसरों से बंधे हुए हैं। जैसे किसी वाहन की चाबी चालक ने लगाई और वाहन चल दिया। वाहन यह नहीं कह सकता कि मैं नहीं चलूंगा।




हमें दूसरे ने गाली दी, टक्कर मारी, अपमान किया और हम एकदम चार्ज हो गए। बिलकुल ऐसे जैसे दूसरे के चाबी लगाने की प्रतीक्षा ही कर रहे थे। कभी विचार करिए किसी ने अपशब्द कहे और हम क्रोधित या व्यथित हो गए, हमने शब्दांे को लिया तभी ऐसा हुआ। क्या कभी मन में यह विचार आता है कि हम दूसरोंे के ऐसे शब्दों को नहीं लेंगे। अपशब्द तीर की तरह चुभते हैं। सामने वाले ने कहा और हम बेहोश हुए। फिर इस बेहोशी में हम हिंसात्मक हो जाते हैं, बेचैन हो जाते हैं, परेशान हो जाते हैं। हमारा होश में रहना भी हमारे हाथ में नहीं रहता। सीधी सी बात है हम इतने से भी अपने मालिक नहीं हैं। कोई दूसरा हम से यदि क्रोध करवा सकता है तो कुछ भी करवा सकता है। वह चापलूसी करके हमसे गलत काम करवा सकता है क्योंकि हम बेहोश हैं, यंत्रवत हैं और यदि मुक्त हैं तो फिर हम निर्णय जागकर लेंगे, होश में लेंगे और इसी होश का नाम है स्वयं के पास बैठना, स्वयं को जानना।

कल्पनाओं को दबाए नहीं, उन्हें पंख दें

जब बच्चा कोई अटपटी बात करता है या कोई ऐसी कल्पना करता है जिसे हम सत्य समझने से झिझकते हैं तो बच्चे को टोक देते हैं। लगभग सभी मां-बाप अपने जीवन में एक यह भूल कर देते हैं, जिससे बच्चे का विकास और उसमें मौजूद संभावनाओं पर एक तरह का पहरा लग जाता है। बच्चों की कल्पनाओं को दबाए नहीं, उन्हें सही दिशा दें। जहां जरूरत पड़े उन्हें पूरा प्रोत्साहन दें।

सुख को गुजर जाने दें, पकड़कर न बैठें

सुख आता है तो हम उसे लपक कर थामने की कोशिश करते हैं, उसे पूरी तरह अपना मानकर बैठ जाते हैं। और जब वह सुख जाने लगता है तो फिर शोर मचाते हैं। ये मानव स्वभाव है, हम सुख के आने पर इतना खुश नहीं होते जितना उसके जाने से निराश हो जाते हैं। दरअसल सुख के आने या जाने में कोई समस्या नहीं है, समस्या तो सुख को हमेशा कसकर पकड़ रखने के हमारे स्वभाव में है। जीवन में जब सुख आए तो दूर से देखकर एक निश्चित फासला बनाकर उसे गुजरने दें। आइने के बहुत पास आ जाएं तो छवि अस्पष्ट हो जाती है। एक दूरी जरूरी है। सुख के साथ बहुत खुशी से उछलकूद न करें। मंद शीतल हवा की तरह उसे भी गुजर जाने दें। जिस दिन हम सुख में इस तरह से सफल हो गए फिर आप पाएंगे एक दिन दुख में भी इसी तरह प्रसन्न हो सकेंगे।

रविवार, जनवरी 16, 2011

कैसे पहचानें कुंडली में शनि दोष

शनि का राशि परिवर्तन होते ही लोग भयभीत हो उठते हैं कि अब शनिदेव न जाने क्या गजब ढाएँगे। जिन लोगों की कुंडली नहीं बनी होती उनके लिए यह बड़ा प्रश्न होता है कि शनि बुरा है या अच्‍छा यह कैसे जानें... शनि की प्रतिकूल अवस्था हमारी दिनचर्या को भी प्रभावित करती है, जिसे नोट करके जाना जा सकता है कि कहीं शनि प्रतिकूल तो नहीं।

1. यदि शरीर में हमेशा थकान व आलसभरा लगने लगे।
2. नहाने-धोने से अरुचि होने लगे या नहाने का वक्त ही न मिले।
3. नए कपड़े खरीदने या पहनने का मौका न मिले।
4. नए कपड़े व जूते जल्दी-जल्दी फटने लगें।
5. घर में तेल, राई, दालें फैलने लगे या नुकसान होने लगे।
6. अलमारी हमेशा अव्यवस्‍िथत रहने लगे।
7. भोजन से बिना कारण अरु‍चि होने लगे।
8. सिर व पिंडलियों में, कमर में दर्द बना रहे।
9. परिवार में पिता से अनबन होने लगे।
10. पढ़ने-लिखने से, लोगों से मिलने से उकताहट होने लगे, चिड़चिड़ाहट होने लगे।


NDयदि ये लक्षण आप स्वयं में महसूस करें, तो शनि का उपाय करें।

तेल, राई, उड़द का दान करें। पीपल के पेड़ को सींचें, दीपक लगाएँ। हनुमान जी व सूर्य की आराधना करें, माँस-मदिरा का त्याग करें, गरीबों की मदद करें, काले रंग न पहनें, काली चीजें दान करें।

अगर आपकी गाड़ी अक्सर खराब ही रहती है...

क्या आपने कभी इस बात पर ध्यान दिया कि आपका वाहन, बाइक, कार या कोई हैवी व्हीकल हमेशा खराब रहता है। आप बार बार उसे ठीक करवाते हैं, उस पर पैसे खर्च करते हैं फिर भी आपका वाहन आपका साथ नहीं देता। ज्योतिष के नजरिए से देखें तो निश्चित ही आपकी कुंडली में शनि और मंगल अशुभ प्रभाव दे रहे हैं।
जी हां, ज्योतिष में वाहन के विषय में शनि और मंगल का विचार किया जाता है। शनि और मंगल के अशुभ प्रभाव से ही आपका वाहन हमेशा खराब रहता है।
यदि कुंडली में शनि या मंगल चौथे भाव के स्वामी होकर अपनी शत्रु राशि में स्थित होते हैं या कुंडली के 6, 8, 12 भाव में होते है तो आपका वाहन हमेशा खराब रहेगा। इससे गाड़ी में हमेशा कुछ-न-कुछ खराबी बनी रहती है। कभी रास्ते में चलते-चलते भी रुक जाती है तो कभी एक बार बंद होने के बाद स्टार्ट नहीं होती। इस परेशानी को ज्योतिषीय तरीकों से भी हल किया जा सकता है। इसके लिए आपको शनि और मंगल को मनाने के उपाय करने होंगे। ये उपाय जितने आसान हैं उतने ही कारगर भी हैं। इन्हें अपनाने से आपको फिर कभी ऐसी परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ेगा।
इसके लिए आप मंगल और शनि से संबंधित उपाय करें-
- अपनी बाइक पर रेडियम से लाल त्रिकोण बनाएं।
- कार में मंगल यंत्र रखें।
- मंगलवार के दिन पेट्रोल, डीजल या गैस न डलवाएं।
- अपने वाहन के आगे सिंदूर से स्वास्तिक बनाएं।
- कौवों को पूड़ी और खीर खिलाएं।

खुद में रहें, दूसरों में न उलझें

अक्सर लोग दुनियादारी में इतने उलझ जाते हैं कि खुद को ही भूल जाते हैं। खुद का ख्याल नहीं होना भी परेशानी देता है। लोग खुद का ध्यान नहीं रखते, दूसरे क्या कर रहे हैं, वे कहां पहुंच रहे हैं, इसी में उनकी जिंदगी गुजर जाती है। यह शरीर, आत्मा हमारी है, हम जब भी कोई काम करें तो उसमें खुद को रखें। ये दुनिया ऊपर वाले का ख्वाब है, परमात्मा की माया है। भगवान जब सपने देखता है तो दुनिया का निर्माण हो जाता है। यह एक सूफी खयाल है। इसी तरह जब हम दुनिया में रहें और यदि हमें यह बात समझ में आ जाए कि है तो परमात्मा का सपना फिर भी सच है और हम इस सच का हिस्सा हैं। इसीलिए इस्लाम में, सूफी परम्परा में एक प्रयोग किया गया है कि जो भी काम हम करें उसमें अच्छी तरह खयाल रखें कि हम हैं। अपना होना न भूल जाएं। चाहे पैदल चल रहे हों, कपड़े बदल रहे हों, स्नान कर रहे हों या खाना खा रहे हों। अपने होने को न भूलें। होता यह है कि हम भूल जाते हैं। हम हैं इसका खयाल जाते ही हम दूसरे चक्करों में उलझ जाते हैं। जब हम रात को सपना देखते हैं तो सपने में जो घट रहा होता है उससे हम जुड़ जाते हैं। कभी-कभी तो परेशान हो जाते हैं, चौंककर नीन्द खुल जाती है, परन्तु दिनभर जागते हुए हमें हम हैं इस बात का खयाल रहे तो रात को सपने में हम जुड़ेंगे नहीं और सपना सपना ही रहेगा जबकि हम सपने में धोखा खा जाते हैं। सपना यथार्थ लगने लगता है।शाहशुजा करमानी ऊंचे दर्जे के फकीर थे। वे ४० साल नहीं सोए। उनके बारे में कहते हैं नीन्द जब उन्हें परेशान करती तो आंखों में नमक का सुरमा लगा लेते। एक दिन ४० साल बाद जब सोए तो सपने में अल्लाह के दीदार हो गए। शाहशुजा ने कहा अर्से से आपको ढूंढ रहा था जागते हुए और अब आप मिले हो तो ख्वाब में। अल्लाह ने जवाब दिया यह तेरे जागने का ही नतीजा है। इसके बाद शाहशुजा आमतौर पर इसलिए नीन्द निकाला करते थे कि नीन्द में अल्लाह के दर्शन हो जाएंगे। अपने सपनों के सद्उपयोग का यह उदाहरण है। यदि हमें होश है कि हम हैं तो हम सपने को यथार्थ नहीं मानेंगे। और यह दुनिया का जो यथार्थ है इसे सपना समझ कर जी लेंगे। इसी में जिन्दगी का अमन और खैरियत है।

शिक्षा वो जो शांति दे


शिक्षा प्रणाली में गलाकाट स्पर्धा अब चिंता का राष्ट्रीय मुद्दा हो गई है। नई पीढ़ी नंबरों की दौड़ और रैंक की होड़ में लगा दी गई है। माता-पिता बिना बच्चे की मानसिक स्थिति को समझे उसे नंबरों की अंधी दौड़ में दौड़ा रहे हैं। आधुनिक शिक्षा प्रणाली से ततकलीक प्रतिभाएं तो पैदा हो रही हैं लेकिन इस पीढ़ी का भविष्य क्या होगा अब इस पर चिंतन करना जरूरी है। नई पीढ़ी अब पूरी तरह भौतिकता के पीछे है, जीवन का दर्शन बदल गया है और सबसे बड़ा नुकसान जो हुआ है वह यह कि इस पीढ़ी के भीतर एक अंशाति है। सारे सुख, विलासिता के साधनों के बावजूद इनके पास शांति नहीं है। शिक्षा के विस्तार को इस युग में खूब लाभ मिला परंतु एक हानि भी हुई कि पढ़े-लिखे लोग अशांत हो गए। आज की शिक्षा सेवा का माध्यम होना थी जो शोषण का कारण बनती गई। ये केवल शिक्षा के खतरे हैं। देवलोकवासी आचार्य श्रीराम शर्मा कहा करते थे केवल शिक्षा ही नहीं विद्या की भी आवश्यकता है। शिक्षा केवल बाहरी जानकारी दे रही है और विद्या भीतरी अनुभूतियां कराती है। शिक्षा संस्थानों, पुस्तकों और अन्य तकनीकी माध्यमों से प्राप्त होती है किंतु विद्या का आरंभ होता है मौलिक चिंतन से। शिक्षा केवल विचार देती है और विद्या विचार को आचार से जोड़ती है। शिक्षा के लिए खूब शिक्षक मिल जाएंगे लेकिन विद्या के लिए गुरु ढूंढऩा पड़ेगा। विद्या कहती है थोड़ा संयम साधो, आज के युग में निजी आवश्यकताओं और महत्वाकांक्षाओं को संभालना ही संयम है और सद्कार्य, सद्भाव का विस्तार करना ही सेवा है। विद्या अपने साथ संयम और सेवा लाती है। किंतु केवल शिक्षा लूट और शोषण करना सिखा रही है। केवल शिक्षा ने लोगों की खोपड़ी और जेब भर दी पर निजी व्यक्तित्व को खोखला कर दिया। मात्र शिक्षा लोगों की आदतें बना देती है और विद्या स्वभाव तैयार करती है। आदतें ध्यान में बाधा हैं इसलिए शिक्षित पुरुष मेडिटेशन में मुश्किल से उतर पाता है। उसे विद्या का सहारा मिला और वह अधिक योग्य होकर ध्यान में उतर जाएगा। केवल शिक्षा खतरनाक है और केवल विद्या भी उपयोगी नहीं होगी। दोनों के संतुलन में जीवन का आनंद है। एक काम इसमें उपयोगी है जरा मुस्कुराइए....।

मित्रता भावों से हो, शक्ति या औहदे से नहीं

अधिकतर लोग मित्रता उनसे गांठ लेते हैं जिनके पास कोई पद हो, वैभव हो या शक्ति हो। यह रिश्ता बहुत महत्वपूर्ण होता है। लोग यह भूल जाते हैं कि जिससे मित्रता कर रहे हैं, उसके गुण क्या है, अमीर हो लेकिन अहंकारी, शक्तिशाली हो लेकिन आततायी, वैभवशाली हो लेकिन भोगप्रवृत्ति का हो तो ऐसे आदमी से दोस्ती करना निरर्थक ही नहीं कभी-कभी अपने लिए भी अपमान का कारण बन सकता है। मित्रता हमेशा भाव और समर्पण देख कर रहें, तभी आपके काम ठीक होंगे। अगर सोद्देश्य मित्रता भी है तो उसमें भी इन बातों का ध्यान रखना जरूरी है। श्रीराम को सुग्रीव व साथियों से इतनी जानकारी मिल गई थी कि सीता का अपहरण हुआ है। कोई राक्षस विमान से सीता को दक्षिण दिशा में ले गया है। मुद्दा था सीताजी की खोज। सुग्रीव ने श्रीराम को आश्वस्त किया था कि सब प्रकार करिहउँ सेवकाई। जेहि बिधि मिलिहि जानकी आई॥ ''मैं सब प्रकार आपकी सेवा करूंगा, जिस उपाय से जानकीजी आकर आपको मिले।ÓÓ श्रीराम से सुग्रीव की पहली ही मुलाकात में यह वार्तालाप हुआ था। श्रीराम के पास यह विकल्प था कि वे सीता शोध जैसे महत्वपूर्ण कार्य के लिए या तो सुग्रीव से मित्रता करें या बालि से। बालि उस समय बलशाली थे और राजा थे किंतु श्रीराम ने मैत्री सुग्रीव से की क्योंकि बालि अहंकारी थे और अनुचित, अन्याय के प्रति विरोध नहीं करते थे। एक और महत्वपूर्ण पक्ष यह था कि श्रीराम और सुग्रीव की मैत्री हनुमानजी ने करवाई थी। कीन्ही प्रीति कछु बीच न राखा। दोनों ने हृदय से प्रीति का कुछ भी अंतर नहीं रखा। यह श्रीराम की विशिष्टï शैली थी कि उन्होंने विवेक से सुग्रीव पर विश्वास किया। जिस पर विश्वास किया जाए, उसे पूरा अधिकार भी दिया जाए। श्रीराम ने सुग्रीव पर पूरा विश्वास कर अधिकार दिया कि वे सीता की खोज करें। इसी विश्वास की प्रेरणा का आधार था कि सुग्रीव ने अपनी पूरी ताकत सीता शोध में झोंक दी। अपनी सेवा से उन्होंने कहा था - राम काजु अरू मोर निहोरा। बानर जूथ जाहु चहुँ ओरा।। '' हे वानरों के समूह यह श्रीराम का कार्य है और मेरा अनुरोध है तुम चारों ओर जाओ।ÓÓ श्रीराम ने सुग्रीव को निर्णय लेने का अधिकार दिया और सुग्रीव उस पर खरे उतरे। सीता की खोज हुई और लक्ष्य की प्राप्ति।

शनिवार, जनवरी 15, 2011

शब्द संवारते हैं हमारा व्यक्तित्व

कहते हैं सृष्टि की रचना शब्द से हुई है। कोई ब्रह्मनाद इस ब्रह्मांड में गूंजा, फिर उसने रूप धरना शुरू किया। शब्दों में बड़ी शक्ति होती है, हम जब भी कुछ कहें, यह समझकर कहें कि वे हमारे बोले गए शब्द क्या प्रभाव पैदा करेंगे। शब्द हमारा व्यक्तित्व और विचार दोनों बनाते हैं, हमारे भीतर क्या गूंज रहा है, हमारा व्यक्तित्व इसी पर निर्भर करता है। जो शब्द हमारे अंदर हमेशा नाद करते रहते हैं, हम स्वयं भी वैसे ही हो जाते हैं। जिस इंसान के मन में परमात्मा के शब्द गूंज रहे हों, उसे हर जगह केवल परमात्मा की तलाश ही होती है, किसी के मन में हमेशा भौतिक इच्छाओं की आवाज उठती रहती है, सो उसे भौतिक और दैहिक सुख की ही तलाश होती है। शरीर सद्कर्मों और मन सद्विचारों से संवरेगा। सद्विचार संवरते हैं सिमरन से, सिमरन के लिए शब्द-नाम की ताकत चाहिए। नाम महिमा के लिए गुरुनानक देव ने कहा है शब्दे धरती, शब्द अकास, शब्द-शब्द भया परगास। सगली सृस्ट शब्द के पाछे, नानक शब्द घटे घट आछे।। इस शब्द ने धरती, सूर्य, चंद्रमा सारी दुनिया पैदा की है। यही शब्द सबके भीतर अपनी धुनकारें दे रहा है। इस नाम की खोज की जाए जो सबके भीतर है। सभी संत-फकीरों ने अध्यात्म को समझाने के लिए अपने-अपने शब्द दिए हैं जो बाद में नाम-वंदना बन गए। गुरुनानक साहिब ने इसे गुरुवाणी, सच्चीवाणी, अकथ-कथ, हुकम, हरि कीर्तन कहा। ऋषि मुनियों ने इसे कभी आकाशवाणी कहा तो कभी रामधुन। चीनी गुरुओं ने ताओ, मुस्लिम फकीरों ने कलमा, बांगें आसमानी, कलामे इलाही, बताया। ईसा मसीह इसे लोगास बता गए। लेकिन फकीरों ने जो नाम शब्द बताया है इसे हम केवल ऐसे शब्दों से न जोड़ लें जो जुबान से निकलते हैं। यह नाम शब्द एहसास का मामला है। हमारे शरीर के भीतर नाम अपनी अनुभूति रखते हैं।जब हम ध्यान करते हैं तो ये नाम या गुरुमंत्र केवल बोलने के शब्द बनकर नहीं बल्कि सुमिरन ध्यान में अपना नाद देते हैं, गूंज ध्वनि देते हैं। यह भीतरी अनुगूंज हमें गहरे ध्यान में उतारती है। कई लोगों को तो गुरुनानक साहिब के वाहे गुरु संबोधन ने भी ध्यान में उतार दिया। यह नाम जप एक पुकार बन जाता है। परमात्मा को पाने के लिए हम जब आतुर होते हैं और उस आतुरता में जो शब्द उच्चारित होते हैं वे नाम जप बन जाते हैं। शिक्षा पद्धति में विषय की पुनरावृत्ति एक विधि है, जिसे रिवीजन लर्निंग कहते हैं। ऐसे ही अध्यात्म के अभ्यास में जप लर्निंग है। निरंतरता बनाए रखिए एक दिन परमात्मा आपको उपलब्ध होगा।

अभाव में जीना सीखें, आनंद अपनेआप मिलेगा

दुनिया सुखों के पीछे दौड़ रही है। हर कोई सबकुछ पाने की होड़ में लगा है। सौ फीसदी सफलता से कम तो किसी को मंजूर ही नहीं है। हम खुद भी ऐसे हैं और बच्चों को भी इसी दौड़ में जुटा दिया है। हर सुख, सारी सुविधा और दुनियाभर का वैभव हर एक ही दिली तमन्ना हो गई है। एक चीज का अभाव भी बर्दाश्त नहीं है, थोड़ी सी असफलता हमें तोड़ देती है। लेकिन इसके बाद भी जो नहीं मिल रहा है, वो है आनंद। दरअसल यह आनंद सबकुछ पा लेने में नहीं है। कभी-कभी अभाव में जीना भी आनंद देने लगता है। अगर आपके भीतर कोई अभाव है तो उसे सद्गुणों से भरने का प्रयास करें, महत्वाकांक्षाओं को हावी न होने दें। मन चाहा मिल जाए इसके लिए तेजी से दौड़ रही है दुनिया। न मिलने का विचार तो लोगों को भीतर तक हिला देता है। संतों ने बार-बार कहा है जो है उसका उपयोग करो तथा जो नहीं है उसे सोच-सोच कर तनाव में मत आओ। हम जो नहीं है उसे हानि मानकर जो है उसका भी लाभ नहीं उठा पाते हैं। आज अभाव की बात की जाए। संतों के पास यह कला होती है कि वे अभाव का भी आनंद उठा लेते हैं। हमारे लिए दो उदाहरण काफी है। श्रीराम वनवास में पूरी तरह से अभाव में थे। जिनका कल राजतिलक होने वाला था उन्हें चौदह वर्ष वनवास जाना पड़ा। इधर रावण के पास ऐसी सत्ता थी जिसे देख देवता भी नतमस्तक थे। एक के पास सबकुछ था फिर भी वह हार गया और दूसरे ने पूर्ण अभाव में भी दुनिया जीत ली। अभाव हमें संघर्ष के लिए प्रेरित करे, कुछ पाने के लिए प्रोत्साहित करे यहां तक तो ठीक है परन्तु हम अभाव में बेचैन हो जाते हैं और परेशान, तनाव ग्रस्त मन लेकर कुछ पाने के लिए दौड़ पड़ते हैं तब क्रोध, हिंसा, भ्रष्ट आचरण हमारे भीतर कब उतार जाते हैं पता ही नहीं चल पाता है।इसे एक और दृष्टि से देख सकते हैं। रावण में भक्ति का अभाव था बाकी सब कुछ था उसके पास। कई लोगों के साथ ऐसा होता है। आदमी अपने अन्दर के अभाव को भरने की कोशिश भी करता है। रावण ने भक्ति के अभाव को अपने अहंकार से भरा था, आज भी कई लोग अपने अभाव को अपनी महत्वाकांक्षा विकृतियों, दुर्गुणों से भरने लगते हैं। जिन्हें भक्ति करना हो वे समझ लें पहली बात अभाव का आनंद उठाना सीखें और अभाव को भरने के लिए लक्ष्य, उद्देश्य पवित्र रखें।

योग्यता हमेशा रहेगी, अपना भोलापन संभाले रखें

आज के दौर में योग्यता तो कई लोगों में मिल जाती है लेकिन सहजता या कह लें भोलापन कम ही लोगों में मिलता है। आजकल भोले इंसान को बेवकूफ या बुद्धू भी कह दिया जाता है। लोग उसे हंसी का पात्र बना देते हैं। दरअसल भोलापन एक दुर्लभ गुण है, इस गुण के होने से आदमी में जो खास बात आ जाती है वह यह कि वह भेदभाव भूल जाता है, अहंकार से दूर हो जाता है। हमारे दो देवताओं में यह गुण समान है, पहले भगवान शिव और दूसरे बाबा हनुमान। दोनों परम शक्तिशाली, ज्ञानी और पराक्रमी हैं लेकिन दोनों के स्वभाव में भोलापन हैं। हमें इस गुण को साधने का प्रयास करना चाहिए, हम सहज हो जाएंगे। शब्द ज्ञान तो बढ़ा देते हैं लेकिन ध्यान को बाधित कर देते हैं। श्रीहनुमानचालीसा दुनिया में खूब बोली जा रही ऐसी पंक्तियां है जो आपको मौन में उतार देंगी और यहीं से ध्यान, मेडिटेशन घटेगा। इसकी छठवीं चौपाई शंकर सुवन केसरी नंदन तेज प्रताप महाजग बंदन को लेकर पंडितों का अलग-अलग मत है। आईए आज शब्द तथा अनुभूति को समझा जाए। कुछ विद्वान कहते हैं शंकर सुवन का अर्थ है हनुमानजी स्वयं शंकर हैं और अन्य का मत है। वे शंकरजी के बेटे हैं। जो पुत्र मानते हैं उनके पास शिवपुराण में व्यक्त हनुमत जन्म कथा का आधार है और स्वयं शंकर हैं ऐसा मानने वाले विनय पत्रिका में प्रकाशित एक क्षेपक कथा का प्रमाण देते हैं। दोहावली तथा आनंद रामायण के प्रसंगों की चर्चा भी की जाती है। सच तो यह है कि हनुमानजी के जन्म की सात-आठ कथाएं हैं। इस कारण भी मान्यता में भेद आना स्वाभाविक है। सुवन शब्द को पकड़कर हम शोध में तो पहुंच सकते हैं, पर भक्ति में नहीं उतर पाएंगे। शंकर सुवन पंक्ति में जो अनुभूति है मात्र शब्द शोध से खोखली हो जाएगी। हमें वहां जाना होगा जहां इनका आरंभ हुआ था। शंकर सुवन लिखते समय तुलसीदासजी का भाव था हनुमानजी को शंकरजी के भोलेपन से जोडऩा। क्योंकि इसी की अगली पंक्ति में लिखा है तेज प्रताप महा जग बंदन। तेजस्वी और प्रतापवान यदि भोलेपन से भरा हो तो वह हनुमान होता है। आज के दौर में जब भोलापन मूर्खता और सरलता बेवकूफी मान ली गई हो तब तुलसी की यह मांग बड़ी जरूरी है कि हनुमान भक्त भोलापन बचा कर रखें। योग्यता और भोलापन मणिकांचन योग है। आज के योग्य लोगों को देख भगवान से यह सवाल पूछने की इच्छा होती है प्रभु, क्या आप वह फर्मा कहीं रख कर भूल गए हो जिसमें भोले और भले लोग तैयार किए जाते थे।

बाहरी आवरण, भीतरी गुणों सा ही हो

यह दिखावे का दौर है, व्यक्ति का महत्व उसके गुणों से नहीं बल्कि उसके बाहरी आवरण से आंका जा रहा है। हम व्यक्तित्व परखते समय केवल बाहरी आवरण यानी कपड़ों और आभूषणों पर टिक जाते हैं। अच्छे कपड़े, आभूषण और सुंदर बनाव-शृंगार हो तो व्यक्तित्व आकर्षित करता लेकिन हम उसके भीतर झांकना भूल जाते हैं। आध्यात्मिक शांति की यात्रा में पहनावा भी एक बड़ा कारण हो सकता है। हम स्वभाव से क्या हैं और हमारे ऊपर का आवरण क्या है? अगर आध्यात्मिक शांति की तलाश है तो हमें बाहर और भीतरी आवरण में समानता लानी होगी। हमारा पहनावा भी हमें भीतर तक प्रभावित और परिवर्तित कर सकता है। क्या पहना जाए इसे लेकर कई लोग दिनभर परेशान रहते हैं। यदि आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो बात केवल कपड़ों की नहीं की जा रही है। हम एक ऐसा आवरण पहन लेते हैं जिसमें पता नहीं लग पाता कि हम भीतर से कुछ और हैं बाहर से कुछ और हैं। सबसे अच्छा ड्रेस कोड यह है कि हम जैसे भीतर हों वैसे ही बाहर रहें। छल के वस्त्र परमात्मा को पसंद नहीं आते। वस्त्रों की योग्यता उसकी उपयोगिता में होती है। किस वस्त्र का किस समय कितना उपयोग किया जाए यह समझदारी कहलाती है। यह समय उपभोक्ता युग है। कपड़े बनाने वाले सावधान हैं कि उपभोक्ता को कैसे कपड़े चाहिए, किन्तु पहनने वाले लापरवाह हैं। वस्त्रों के उपयोग का एक उदाहरण रामायण में अनसूया-सीता भेंट प्रसंग में आता है। श्रीराम, लक्ष्मण और सीता के साथ दंडकारण्य में ऋषि-मुनियों की राक्षसों से रक्षा के लिए पहुंचे हैं। वहां वे ऋषि दंपत्ति अत्रि-अनसूया से मिलते हैं। अनसूया वन-जीवन की आवश्यकताओं को समझते हुए सीता को ऐसे वस्त्र और आभूषण भेंट करती हैं जो कभी मैले नहीं होते और जिन्हें साफ करने की आवश्यकता नहीं होती। दिव्य बसन भूषन पहिराए। जो नित नूतन अमल सुहाए॥कह रिषिबधू सरस मृदु बानी। नारिधर्म कछु ब्याज बखानी॥ उन्हें (सीता को) ऐसे दिव्य वस्त्र और आभूषण पहनाए, जो नित्य नए निर्मल और सुहावने बने रहते हैं। प्राकृत वस्त्राभूषण में तीन दोष होते हैं। वे पुराने, मलिन और शोभाहीन हो जाते हैं। ये दिव्य वस्त्र इन दोषों से रहित थे। अयोध्या से वनगमन से निकलते समय श्रीराम ने सीता को कहा था - अपने हार आदि आभूषण गुरुपत्नी अरुंधती को दे दो। वन में सीता क लिए जो वस्त्र-आभूषण उपयोगी थे, वही अनसूया ने उन्हें दे दिए थे।जब हम पहनावे की बात करें तो पहले भीतरी पहनावे यानी हमारे स्वभाव और गुणों को सुधारें, बाहरी आवरण स्वत: ही आकर्षित करने लगेगा।

प्रकृति से जुड़ें, परमात्मा मिल जाएंगे

परमात्मा को अनुभव करने का सबसे बेहतर रास्ता है प्रकृति। कहते हैं प्रकृति परमात्मा की प्रतिनिधि है। नदियां, पहाड़, जंगल, वनस्पति और जीव, सभी परमात्मा के प्रतिनिधि है। भारतीय मनीषियों ने इंसान को परमात्मा से जोडऩे के लिए प्रकृति के जरिए ही प्रयास करने के तरीके इजाद किए। ये तरीके ही हमारी संस्कृति में व्रत-त्योहार और उत्सव बनकर आए हैं। इन उत्सवों के मर्म को समझें, इसके आनंद को अनुभव करेंगे तो परमात्मा खुद आपको महसूस होने लगेगा।

परमात्मा ने मनुष्य को ही यह संभावना दी है कि वह अपनी चेतना को ऊपर उठा सकता है तब देव तुल्य बन जाएगा। चेतना का स्वभाव है यदि इसे ऊपर नहीं उठाया गया तो यह नीचे प्रवाहित होगी ही और तब पतन निश्चित है। अत: मनुष्य के पास यह मौका है कि वह दोनों ओर जा सकता है श्रेष्ठ पर भी, निकृष्ट पर भी। चेतना को यदि श्रेष्ठ पर ले जाना है तो एक तरीका यह भी है कि उसे प्रकृति से जोड़ें। प्रकृति परमात्मा की प्रतिनिधि है। ये तो हमारे पर्यावरण दोष ने हमें प्रकृति से दूर किया है और इसी कारण हम परमात्मा से भी बिछड़ गए हैं। भारतीय शास्त्रों ने कुछ त्यौहारों को अद्भुत रूप दिया है। ऐसा ही एक त्यौहार है गोवत्स द्वादशी। इस दिन गोपूजन का महत्व है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में गाय उसकी सच्ची प्रतिनिधि है। माना तो यहां तक गया है धरती को जो अमृत मिलता है वह गाय के दूध के रूप में मिलता है। हम जितना अधिक गाय को पूजेंगे समझ लीजिए उतना ही प्रकृति के प्रति सम्मान दर्शा रहे होंगे। यह कैसे संभव है कि कोई प्रकृति से प्रेम करे और गाय पर अत्याचार। गाय से जुडऩे का अर्थ है अपने अस्तित्व से अहंकार को मुक्त करना। हम बुद्धि और अहंकार से इतने अधिक भर गए हैं कि परमात्मा के लिए कोई स्थान रिक्त ही नहीं रहा। हिंदुओं के दो प्रमुख अवतार श्रीराम और श्रीकृष्ण ने प्रकृति के दो प्रतिनिधियों को अपनी लीला में विशेष स्थान दिया है। श्रीराम ने वानरों को तथा श्रीकृष्ण ने गायों को। मनुष्य का शरीर यदि बंदरों के शरीर का विकास है तो मनुष्य की आत्मा गाय की आत्मा का विकास है। यदि गाय की आंख में आंख डालकर आप ५ मिनट रुक जाएं तो आपका ध्यान लग जाएगा। परमात्मा की कृपा चाहिए तो प्रकृति का सम्मान करें।

सावधान, कहीं हम वस्तु तो नहीं बन रहे

भौतिकता के दौर में जो सबसे बड़ा नुकसान हुआ है, वह है मूल्यों का खोना। विलासिता के दौर में मनुष्य का स्तर भी एक वस्तु के बराबर होता जा रहा है। हमने बड़े-बड़े बाजार खड़े कर लिए लेकिन दुर्घटना यह घट गई कि इस बाजार में हमारी औकात सामान जितनी ही रह गई है। हम जीवन का आनंद तलाशने के लिए बाजार में निकले और परेशानियां खरीद लाए। अक्सर जीवन में यह कमी रह जाती है, हमें चाहिए क्या और हम क्या खरीद रहे हैं।

जरूरत की चादर और मोह की दुशाला इन दोनों में जो फर्क है उस अंतर को समझने का अब समय आ रहा है। यह पूरा सप्ताह दीपावली के पूर्व खूब खरीददारी का समय होगा। धन, वैभव, सम्पत्ति और साधन सभी अपने आकर्षक रूप में साधकों को घेरेंगे। वस्तुएं खरीदते-खरीदते कहीं हम स्वयं भी वस्तु न बन जाएं। अध्यात्म मार्ग के लोगों को ध्यान रखना होगा कि आवश्यक वस्तुएं तो बसाई जाएं लेकिन उससे मोह न पालें, क्योंकि मोह धीरे से लोभ में बदल जाएगा और लोभ भक्ति में बाधक होता है। आने वाले सात दिनों में माया अपने पूरे दबाव के साथ साधकों के जीवन में प्रवेश हेतु तैयार रहेगी। परमहंस रामकृष्ण कहा करते थे माया को सरलता से समझना हो तो श्रीरामकथा के एक दृश्य में प्रवेश किया जाए। वनवास के समय श्रीराम आगे चलते थे मध्य में सीताजी होती थीं और उनके पीछे लक्ष्मण रहते थे। इस दृश्य पर तुलसीदासजी ने लिखा है च्च्आगे राम अनुज पुनि पाछें मुनि बर बेष बने अति काछें, उभय बीच सिय सोहति कैसे। ब्रह्म जीव बिच माया जैसेज्ज् इसका अर्थ है भगवान श्रीराम परमात्मा का रूप हैं, लक्ष्मणजी आत्मा या कहें जीवात्मा हैं और इन दोनों के बीच में माया स्वरूप में सीताजी हैं। सीताजी रामजी के चरणों की अनुगामी थीं। जहां-जहां श्रीराम पैर रखते थे वहीं-वहीं सीताजी चलती थीं और इसी कारण लक्ष्मणजी श्रीरामजी को ठीक से देख नहीं पाते थे। संयोग से कोई मोड़ आ जाए तो लक्ष्मणजी को श्रीराम दिख जाते थे। संदेश यह है कि परमात्मा और जीवात्मा के बीच जब तक माया है परमात्मा दिखेंगे नहीं। किसी मोड़ पर माया जरा सी हटी और परमात्मा के दर्शन हुए। भक्ति में ऐसे मोड़ आते ही रहते हैं। इसलिए आने वाले सात दिनों में माया तो रहेगी पर हमें मोड़ बनाए रखना है। यहीं हमारी भक्ति की परीक्षा होगी।

यह माया ही हमें परमात्मा से दूर रखती है। परमात्मा कभी अपनी माया हमारे बीच से नहीं हटाएगा। यह प्रयास तो खुद हमें करना होगा कि माया से ऊपर उठकर या दाएं-बाएं होकर हम परमात्मा को देख लें। यह एक बार का काम नहीं, इसके लिए लगातार प्रयासरत होना पड़ेगा।

अगर पाने की चाह है तो खोने से न डरें

हम दुनिया का हर सुख चाहते हैं लेकिन अगर एक भी चीज खोनी हो तो हम सहम जाते हैं, डर जाते हैं। परमात्मा ने इस संसार को रचा, तो नियम ही कुछ ऐसा बनाया कि हमें बिना मूल्य चुकाए कोई चीज मिल ही नहीं सकती है। और अगर बात खुद परमात्मा को पाने की है तो उसके लिए ऐसा मूल्य भी चुकाना पड़ेगा। परमात्मा को पाना है तो खुद की पहचान खोनी होगी। हर इंसान को अपनी पहचान से बड़ा मोह होता है, लेकिन जब परमात्मा से मिलना हो तो फिर उसी का होकर मिलना पड़ता है।हर उपलब्ध वस्तु का अपना एक मूल्य होता है। जो लोग परमात्मा को पाना चाहते हैं उन्हें अच्छा खासा मोल चुकाने की तैयारी रखना होगी। सच तो यह है कि ईश्वर जैसी महान हस्ती को पाने के लिए एक बड़ा मूल्य चुकाना होगा और वह है खुद ही को खो देना। कोई यह सोचे कि यह सत्ता थोड़े से धन से, सम्पत्ति से या मान देने से मिल जाएगी तो यह भ्रम होगा। खुद ही को खर्च किए बिना परमात्मा नहीं मिलेगा। अपने निज का दांव लगाना पड़ेगा, अपनी ही आहूति देना पड़ेगी। हनुमानजी का उदाहरण लें। जब तक उनके जीवन में श्रीराम नहीं आए थे वे केसरी के बेटे के रूप में तथा सुग्रीव के सचिव के रूप में जाने जाते थे। जैसे ही श्रीराम उनके जीवन में आए हनुमानजी ने अपनी सारी पहचान समाप्त कर दी और पूरी तरह राममय हो गए। श्रीराम जितने हनुमान को मिले उतने शायद ही किसी को मिले होंगे। कारण वही था हनुमानजी ने स्वयं को पूरा खो दिया था और खुद को खोने के बाद जो मिला वह अनमोल है। हनुमानजी इसीलिए सभी धर्मों में प्रिय हैं। हर संप्रदाय का व्यक्ति वायु का उपयोग करता है और हनुमानजी वायु के देवता हैं। कोई सा भी धर्म हो उस परमसत्ता तक पहुंचने के लिए सिद्धांत सबके एक ही होंगे। समझदार भक्त किसी भी धर्म के हों अपने सम्प्रदाय को मार्ग की तरह उपयोग करते हैं और मंजिल पर पहुंचने पर मार्ग को छोड़ देते हैं। जो नासमझ हैं वह मार्ग पर ही टिक जाते हैं। संप्रदाय एक मार्ग है। अब मार्ग या संप्रदाय का क्या दोष, वह तो लोग गलत उपयोग करते हैं इसलिए संप्रदाय शब्द बदनाम हो गया। यह तो वाहन की तरह है। हम वाहन का उपयोग करने के बाद उसको छोड़ देते हैं अपने ऊपर ढोते नहीं। यदि कोई वाहन को ढोए तो इसमें वाहन की क्या गलती। संप्रदाय भी इसी तरह है। हनुमानजी अपने चरित्र से यही बताते हैं कि उस परम सत्ता को पाने के लिए विलीन हो जाओ और ऐसी अवस्था में धर्म और संप्रदाय आड़े नहीं आएंगे। आपको वह परम सत्ता उपलब्ध हो जाएगी जिसके लिए आप संसार में आए हैं।

शांति बाहर नहीं, भीतर खोजें

कई लोग जीवनभर खूब मेहनत करते हैं, फिर जब मन भारी होता है वे तीर्थों, पहाड़ों या हील स्टेशनों का रास्ता पकड़ते हैं। शांति की तलाश में दुनिया घूम लेते हैं लेकिन एक जगह जाना भूल जाते हैं। खुद के भीतर। जिस शांति की तलाश में दुनिया भटक रही है, वह हमारे अपने भीतर ही है। बस जरूरत है उसे पहचानने की, उसकी ओर आगे बढऩे की, खुद के भीतर झांकने की। हम अपनी सारी ऊर्जा खत्म कर देते हैं, शांति की खोज में, जबकि शांति का सबसे सीधा और आसान तरीका है भीतर की ऊर्जा का रूप बदलना। जिन्हें शान्ति की खोज करना है उन्हें अपने भीतर की ऊर्जा को जानना होगा। हम ज्यादातर अपनी जीवन ऊर्जा का उपयोग कर ही नहीं पाते हैं। इसका सबसे अच्छा उपयोग है इसका रूपान्तरण करना। यह ऊर्जा अधिकांशत: मूलाधार चक्र पर पड़ी रहती है। इसे कल्पना के साथ सांस का प्रयोग करते हुए नीचे से ऊपर के चक्रों पर लाकर सहस्त्रार चक्र पर छोडऩा है। बिना किसी तनाव के इसको अपनी दिनचर्या में जोड़ लें और धैर्य के साथ करें। ऊर्जा जितने ऊपर के चक्रों पर है हम उतने ही पवित्र रहेंगे और हम जितने पवित्र हैं उतने ही शान्त होंगे। इसीलिए शान्ति की खोज बाहर न करके भीतर ही की जाए।पहले तो ऊर्जा को ऊपर उठाइए तथा दूसरा इसके अपव्यय को रोकें। ऊर्जा को बेकार के खर्च होने से रोकने के लिए अच्छा तरीका है मंत्रजप करें। व्यर्थ होती ऊर्जा सार्थक हो जाएगी। जब आप ऊर्जा के रूपान्तरण में लगेंगे तो पहली बाधा बाहर से नहीं भीतर से ही आएगी और यह कार्य करेगा हमारा मन। इसलिए अपने मन पर हमेशा संदेह रखें। हम एक भूल और कर जाते हैं इस मन को हम अपना समझ लेते हैं, जबकि इसका निर्माण हमारे लिए दूसरों ने किया है। माता-पिता, मित्र, रिश्तेदार, शिक्षक आदि ने। जो हमारा बीता समय है, उसने हमारे मन को बनाया है। ये अतीत की स्मृतियां हमारे वर्तमान को आहत करती हैं, इसी कारण हमारा मन या तो अतीत से बंधा है या भविष्य से जुड़ा रहेगा। मन वर्तमान से सम्बन्ध बनाने में परहेज रखता है। मन जितना वर्तमान से जुड़ेगा, उतने ही हम शान्त रहेंगे। इसी को जागरण कहा गया है। तो जाग्रत रहें और ऊर्जा को ऊपर उठाएं, फिर संसार की कोई परिस्थिति आपको अशान्त नहीं कर सकती। इन दोनों काम में जिससे आपको मदद मिल सकती है।

होश में रहें, जीवन खिल उठेगा

केवल खुमारी में न होना ही होश में होना नहीं है। हम होश में हैं या नहीं यह पता चलता है हमारे नजरिए से। हम अपने भीतर की संभावनाओं को सकारात्मक नजरिए से देखें, विपरित परिस्थितियों में भी आंतरिक विकास के प्रति जागरूक रहें। अगर हम होश में रहेंगे तो जीवन में संभावनाएं बरकरार रहेंगी। खुद को पूरे समय होश में रखने का एक तरीका है ध्यान।

कीचड़ में कमल खिलता है यह एक सामान्य सी कहावत है और प्रकृति का सच्चा अनूठा दृश्य है। कमल तो बेजोड़ और सर्वमान्य है ही, हिन्दू देवताओं का अलंकरण और पूजा की सामग्री है।

पर आज बात कीचड़ की कर लें। पहली बात तो यह कि कीचड़ को सिर्फ कीचड़ ही न समझा जाए इसमें कमल होने की संभावना छिपी हुई है। यदि नजर में परमात्मा है तो कीचड़ के भीतर छिपा कमल हम प्राप्त कर सकेंगे, अन्यथा सतही दृष्टि से तो कमल को भी हम कीचड़ बनाकर छोड़ देंगे। कीचड़ और कमल के परमात्मा के नियम को और थोड़ा खुलकर समझ लें। आप दुनियादारी में जितने गहरे उतरते जाएंगे आपको कीचड़ के मायने समझ में आने लगेंगे। अब यदि बाहर कमल खिल सकता हो तो हमारे भीतर क्यों नहीं। हमारे शरीर के श्रेष्ठतम और सातवें चक्र सहस्त्रार का स्वरूप खिले कमल जैसा है। आपके भीतर कीचड़ में कमल खिलने का अर्थ है अब आप जो भी काम करेंगे पूरी तरह होश में करेंगे। कमल के रूप में आपका जागरण खिला है। होश का अर्थ है आप अपने ही कृत्य के दृष्टा हो गए। इस कमल खिलाने की क्रिया का नाम है ध्यान। पर ध्यान के लिए समय की झंझट है लोगों के पास।

कब करें ध्यान। इस वक्त समय के मामले में दो तरह के लोग हैं। एक वे हैं जिन्हें चौबीस घंटे भी कम पड़ रहे हैं दूसरे वे हैं जिन्हें भारी पड़ रहे हैं कि चौबीस घंटे बिताएं तो कैसे बिताएं। एक मध्य मार्ग निकाला जा सकता है। २४ घंटे होश की चिंता छोड़ें। सिर्फ पांच या दस मिनट, पूरी तरह से ध्यान में बिताएं। थोड़ी देर का मेडिटेशन पूरे चौबीस घंटे पर प्रभाव रखेगा। करके देखिए पता लग जाएगा, कीचड़ में कमल कैसे खिलता है।

मौन ही है शांति का सबसे आसान रास्ता

शांति चाहते हैं तो मौन सीखिए, केवल मुंह से चुप रहना ही मौन नहीं है। यह अभ्यास से आता है, हम मौन रहते नहीं, मौन हमारे भीतर घटता है। जब हम इसके सही तरीके और इसकी गंभीरता को समझ लेंगे, हमें मौन रहने की कोशिश नहीं करना पड़ेगी, यह खुद हमारे भीतर घटने लगेगा। जीवन में शांति उतरेगी।

मौन के वृक्ष पर शान्ति के फल लगते हैं। आज भी कई गुरु दीक्षा देते समय अपने शिष्यों से कहते हैं हमारे और तुम्हारे बीच मौन घटना चाहिए। इसका सीधा सा अर्थ है अपने गुरु से कम से कम बात करें। मौन तभी सम्पन्न होगा। गुरु शिष्य के बीच जितना मौन होगा शान्ति की उपलब्धि शिष्य को उतनी अधिक होगी। गौतम बुद्ध मौन पर बहुत जोर देते थे। एक दिन अपने शिष्यों के बीच एक फूल लेकर बैठ गए थे और एक भी शब्द बोलते नहीं थे। सारे शिष्य बेचैन हो गए। शिष्यों की मांग रहती है गुरु बोलें फिर हम बोलें। कई बार तो शिष्य लोग गुरु के नहीं बोलने पर गुरु का अहंकार बता देते हैं। यह मान लेते हैं कि हमारे सद्गुरु हमसे दूर हो गए। दरअसल गुरु बोलकर शब्द खर्च नहीं करते बल्कि मौन रहकर अपने शिष्य का मन पढ़ते हैं। बुद्ध का एक शिष्य महाकश्यप जब हंसने लगा तो बुद्ध ने वह फूल उसको दे दिया और अन्य शिष्यों से कहने लगे मुझे जो कहना था मैंने इस महाकश्यप को कह दिया, अब आप लोग इसी से पूछ लो। सब महाकश्यप की ओर मुड़े तो उनका जवाब था जब उन्होंने नहीं कहा तो मैं कैसे बोलूं। सारी बात आपसी समझ की है। मौन की वाणी इसी को कहते हैं। इसे मौन का हस्तांतरण भी माना गया है। इसका यह मतलब नहीं है कि गुरु से जो ज्ञान प्राप्त हो वह मौन के नाम पर पचा लिया जाए। गुरु के मौन से शिष्य को जो बोध होता है उसे समय आने पर वाणी दी जा सकती है। पर वह वाणी तभी प्रभावशाली होगी जब गुरु और शिष्य के बीच गहरा मौन घटा हो। मौन का हस्तांतरण पति-पत्नी के बीच, बाप-बेटे, भाई-भाई के बीच बिल्कुल ऐसे ही घट सकता है और सम्बन्धों में शान्ति, गरिमा, प्रेम प्रकट होगा।